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राहुल गांधी की मजदूरों से मिलने की मानवीय पहल

राहुल गांधी की मजदूरों से मिलने की मानवीय पहल
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संजय रोकड़े

कोईदो राय नहीं है कि देश के इस बदहाल वर्तमान हालात मेंराहुल गांधी अपने लिए एक नई राजनीतिक जमीन की तलाश में घर से बाहर निकलकर आम गरीब और मजदूर से संवाद कर रहे हैं। पर सवाल है कि वे करे भी क्यूं न? और इससे बड़ा सवाल तो ये भी है किआखिर क्यूं देश के रहनुमाओं ने मजदूरों के सामने जीने-मरने की परिस्थिति निर्मितकर राहुल जैसे सियासतदानों को सियासत करने का मौका दिया।

बड़ीबात तो ये यह है कि इतनी विकट परिस्थितियों में भी कोई नेता घर से बाहर निकलकरमजदूरों से बात न करे, उनकेबीच शामिल होकर उनका दुख-दर्द ना जाने, इससे बड़ी मूर्खता एक समझदार नेता के लिए क्या होसकती है। अब तक कहते भी आए हैं कि राहुल ने जनता के बीच न जाने की नासमझी बहुत कर ली है। जब लास्ट टाइम अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष केपद से राहुल ने इस्तीफा दिया था, उस समय शायद उनके इस्तीफा देने कामर्म भी कुछ यही था कि अब वे अपने दल में भी सच्चा लोकतंत्र स्थापित करना चाहते हैं, मसलन कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पदपर किसी आम गरीब इंसान के बेटे को देखना चाहते हैं।

खैर, इस्तीफा देते समय ये वो उनकी भावनात्मक पहल थी या इस बहाने वे लगातार मिलती हार और अपनी नाकामायाबियों में आमजन को शरीक करना चाहते थे, लेकिन कोरोना जैसी महामारी के बेहद रिस्की दौर में घर से बाहर निकलकर मजदूरों से जो संवाद कर रहे हैं, उनकी ये पहल उनको जनता के बीच किसी सहयोगी की तरह ही पेश कर रही है। मजदूरों से बात करने का ये विचार उन पर लगने वाले उन आरोपों को भी धो रहा है, जो जब-तब विपक्षियों द्वारा उनके साथ-साथ परिवार के सदस्यों पर लगते रहे हैं।

जैसेये लोग क्या जाने गांव, गरीब, किसान और मजदूर का दर्द। ये तो पांचसितारा होटलों में सुविधाएं भोगने वाले रईस हैं। हवाई जहाज में अपना जन्मदिन मनाने वाले वंशवाद की राजनीतिके पोषक हैं। इस देश के सबसे बड़े राजनीतिक घराने सेताल्लुकात रखने वाले वंशवादी नेता हैं.... आदि आदि, उन्हें कहां आम गरीब व मजदूरों की चिंता।लेकिन राहुल की इस पहल ने उन पर लगने वाले उन सब दागों को मिटाने का भी कामकिया है, जो उन्हें एक आम गरीब से दूर रखने की इमेजबनाते रहे हैं

वैसेतो अब लोकतंत्र की भी यही मांग है कि जो नेता लोगों के बीच होगा, लोगों के हाल जानेगा, वही लोगों की तकलीफ को दूर करने के लिएसत्ता पर विराजमान होगा। शायद यही बात अब कहीं जाकर राहुल को समझ आ गई हो। जो भी हो, जिस तरह से राहुल ने दिल्ली के पैदलचलने वाले मजदूरों से सड़क पर संवाद किया, उनसे उनके दुख-सुख पर बात की और उनकोअपने आशियानों तक भिजवाया वो वाकई काबिले-तारीफहै।

येभी जानते हैं कि जब तक वे सत्ता से महरूम हैं, तब तक आम गरीब के साथ हैं, उनकी बात कर रहे हैं, लेकिन जब वे भी सत्तानशींहोजाएंगे तब उनको भी इन सत्ता के मद में मदमस्त होनेवाले सत्ताधारियों की तरह गरीब और गरीब की तकलीफ कम ही दिखाई देगी। या हो सकता हैदिखाई ही न दे। जैसे अभी के सत्ताधारियों को दिखाई नहीं दे रही है। पर इस समय तो राहुल का सड़क पर आकर मजदूरों से बात करना दिल कोसुकून दे गया।

वैसे देखा जाए तो मजदूरों की इस दयनीय स्थिति के लिए उनके ही पुरखों को जिम्मेवार ठहराया जा सकता है। क्यूं आखिर क्यूं, उनके पुरखे सत्ता में रहते कुछ ऐसा नहीं कर गए जिसके चलते मजदूरों को आज यह दिन देखने को नहीं मिलता। खैर! ये आरोप-प्रत्यारोप से कहीं अधिक राहुल की सदाशयता को स्वीकार करने का समय है।

जिस वक्त सत्ता की मलाई का स्वाद चखने वाले सत्ताधीशों को बाहर आकर मजदूरों की परेशानियों से रूबरू होना चाहिए था, उस वक्त वे कहीं और एशो-आराम फरमा रहे थे। उनकी जगह उनका यह काम राहुल कर रहे हैं तो क्या हर्ज है! यह तो वाकई स्वागत योग्य है। वो इसलिए भी कि आज हर कोई कोरोना के डर से घर में दुबक के बैठा है। कोई मंत्री होने के बावजूद मजदूरों की परेशानियों से मुंह मोड़कर ‘रामायण-महाभारत’ देखने में मशगूल है।

हालांकि ये उनके अपने संस्कार हो सकते हैं, लेकिन इस वक्त राहुल ने मजदूर के दर्दको करीब से जानने के लिए उनके बीच बैठकर कुछ हद तक उनके दुख-दर्द को कम करने का मनतो बनाया। राहुल की इस पहल पर वित्तमंत्रीनिर्मला सीतारमण का गुस्सा जायज है। वैसे भी कोरोना के प्रकोप से बचने के लिए लगाएगए लॉकडाउन में फंसे प्रवासी मजदूरों की मुश्किलों को लेकर राहुल गांधी लगातारकेंद्र सरकार पर हमलावर जो हैं।

अभी-अभीसोशल मीडिया पर मजदूरों से मुलाकात का एक वीडियो भी खूब ट्रेंड हो रहा है। इस वीडियोमें मजदूरों के प्रति वजीरे-आजम नरेन्द्र भाई दामोदरदास मोदी की उदासीनता साफ देखी जा सकती है। इस वीडियो में बड़ी संख्या में मजदूर पैदल हीअपने-अपने राज्यों की ओर लौटने को मजबूर हैं। इस वीडियो में राहुल की आवाज में मजदूरों कीमुश्किलों को काफी हद तक बयां किया गया है। इस बीच कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीयअध्यक्ष और केरल के वायनाड से सांसद राहुल गांधी का यह वीडियो अब यूट्यूब चैनल पर भी खूब देखा जारहा है।

जिस संवेदना के साथ राहुल मजदूरों से उनके हालातों पर बात कर रहे हैं, उनकी परेशानियां पूछते दिखाई रहे हैं, वह लोगों को काफी हद तक अपील कर रही है। राहुल ने जिन मजदूरों से बात की है, वे यूपी के झांसी के निवासी हैं। पूरा परिवार ही पैदल झांसी के लिए निकल पड़ा था। वे हरियाणा की एक फैक्ट्री में काम करते थे। राहुल जब इन मजदूरों से मुखातिब हुए तो मजदूरों ने बताया कि उन्हें कहीं से भी एक पैसे की मदद नहीं मिली। फिर राहुल ने पूछा कि आपके पास पैसा है या नहीं? इसके बाद बातचीत में मजदूरों ने बताया कि उन्हें एक भी पैसे की मदद कहीं से नहीं मिली। मजदूरों का कहना कि अब हमें कोरोना की नहीं पेट की बीमारी सता रही है... बेहद मार्मिक दृश्य था वो।

मतलबजिस तरह से मजदूरों के साथ संवेदनशील बातें हो रही थीं, उनका असर अब तमाम आम इंसानों पर देखाजा सकता है। राहुल को मजदूरों ने जब ये बताया कि साहब हमें कोरोना की नहीं पेटकी बीमारी सता रही है तो वे खुद को भावविभोर होने से नहीं बचा पाए। इसके साथ ही राहुल सेमजदूरों ने गुहार लगाई कि हमको गांव पहुंचा दीजिए, हमारा घर से बाहर निकलना ही गुनाह होगया, तब राहुल खुद को पसीजने से रोक नहींरोकपाए और उन प्रवासी मजदूरों को घर तक छुड़वाने को मजबूर हो गए।

मतलबइस तरह के मार्मिक दृश्यों से मोदी सरकार की नीति और नीयत में फर्क साफ दिखाई देता है। तो फिर निर्मलासीतारमण का आगबबूला होना तो जायज ही कहा जा सकता है। बहरहाल, राहुल की यह नई राजनीतिक पहल उन्हेंकितना फायदा दिला पाएगी, यह तो अभी वक्त के गर्भ में है लेकिन ये जोमानवीय पहल की है, वो जरूर मजदूरों के दिलो-दिमाग में जन्म-जन्मतक बसी रहेगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकारहैं।सम-सामयिक विषयों पर लेखन करते हैं। इस लेख मेंव्यक्त विचार उनके निजी हैं। उदय सर्वोदय का उससे सहमत अथवा असहमत होनाआवश्यक नहीं है।)

Updated : 25 May 2020 5:12 PM GMT
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