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रूस-अमेरिका ने दुनिया को संकट में डाला

रूस-अमेरिका ने दुनिया को संकट में डाला
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लेख ¦ अरुण 'सहयोगी' दमी यार किसके...! दम लगाई खिसके...!! यह कहावत अमेरिका पर बिल्कुल फिट बैठती है. अमेरिका की फितरत है कि जब तक उसका स्वार्थ रहता है तब तक ही वह संधि-समझौतों को मानता है वरना मुकर जाता है. हाल ही में अमेरिका ने मध्यम दूरी परमाणु शक्ति संधि (Intermediate Range Nuclear Forces Treaty) से बाहर होने और रूस द्वारा बैठक निलंबित किए जाने से पूरी दुनिया सकते में है. पिछले वर्ष से ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इससे अलग होने की बात कर रहे थे. अमेरिका और रूस के बीच तनाव दूर करने में इस संधि की अहम भूमिका रही है.जहां तक अमेरिका के इस संधि से अलग होने की बात है तो उसका आरोप है कि रूस इस संधि का उल्लंघन कर रहा है और संधि के तहत प्रतिबंधित हथियारों का भी इस्तेमाल कर रहा है. इसके अलावा अमेरिका इसकी जगह पर दूसरी संधि करना चाहता है, जिसमें वह उन देशों को भी शामिल करना चाहता है, जिनके पास में लंबी दूरी की मिसाइलें हैं. इनमें चीन के अलावा नॉर्थ कोरिया भी शामिल है. हालांकि अमेरिका के इस संधि से हटने के बाद उसकी हर तरफ से आलोचना हो रही है. इंटरमीडिएट रेंज न्यूक्लियर फोर्सेज (आईएनएफ) को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 02 फरवरी 2019 को स्थगित कर दिया. इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने संधि से अलग होने और इसे स्थगित करने की घोषणा की थी. अमेरिका ने रूस को चेतावनी दी थी कि यदि रूस इस संधि का उल्लंघन जारी रखता है तो अगले 6 महीने के भीतर ही अमेरिका इस संधि से बाहर निकल सकता है.संधि के पीछे का सच क्या है?अतीत के आईने में देखें तो स्पष्ट है कि 8 दिसंबर, 1987 को मध्यम दूरी परमाणु शक्ति संधि पर हस्ताक्षर हुए थे. यह समझौता हथियार नियंत्रण पर छह वर्षों तक चली वार्ताओं का परिणाम था. उस वक्त इस संधि पर सोवियत संघ के तत्कालीन राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव और अमेरिका की तरफ से रोनाल्ड रेगेन ने दस्तखत किए थे. संधि को कराने में ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गेट थेचर की अहम भमिका थी. यह समझौता 1 जून 1988 से लागू हुआ था. दरअसल 1980 के दशक में सोवियत संघ अपने यूरोपीय क्षेत्र में परमाणु हमला करने में संपन्न एसएस-20 मिसाइल को तैनात किया था. इसकी रेंज 4700-5500 किमी थी. मिसाइल पश्चिमी यूरोप तक हमला करने में सक्षम थी. इसकी वजह से यूरोप समेत अमेरिका में काफी तनाव था. इसके बाद अमेरिका ने भी यूरोप में अपनी मिसाइल तैनात कर दी थी, जिसने आग में घी डालने का काम किया. संधि के तहत 311 मील से 3420 मील रेंज वाली जमीन आधारित क्रूज मिसाइल या बैलिस्टिक मिसाइल को प्रतिबंधित किया गया. हालांकि इसके तहत हवा एवं समुद्र से प्रक्षेपित की जाने वाली मिसाइलों को प्रतिबंधित नहीं किया गया. इसमें अमेरिका की टोमाहॉक एवं रूस की कैबिलर मिसाइल आती थी.रूस और अमेरिका ने नष्ट की थीं मिसाइलें इस दौरान दोनों ही देशों ने भविष्य में मध्यम व छोटी दूरी की मिसाइलों का निर्माण न करने का वचन दिया था. इसके तहत यह भी तय हुआ कि दोनों अपनी कुछ मिसाइलें नष्ट करके उनकी संख्या को एक निश्चित सीमा के भीतर ला देंगे. अनुमान है कि वर्ष 1991 तक करीब 2,700 मिसाइलों को नष्ट किया जा चुका है. इस संधि के तहत अमेरिका ने जहां BGM-109G ग्राउंड लॉन्च क्रूज मिसाइल, पर्शिंग 1ए, पर्शिंग II मिसाइल को खत्मा किया तो वहीं सोवियत संघ SS-4 सैंडल, SS-5 स्केन, SS-12 स्केलबोर्ड, SS-20 सेबर, SS-23 स्पाइडर, SSC-X-4 स्लिंगशॉट को नष्ट किया था.चीन, फ्रांस और जर्मनी भी विरोध में अमेरिका के इससे हटने के बाद चीन ने इस पर अफसोस जाहिर किया है. चीन का कहना है कि यह संधि विश्व में शांति बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है. इसके लिए चीन ने दोनों देशों से वार्ता कर मतभेद समाप्त करने की अपील की है. चीन ने साफ कर दिया है कि अमेरिका के इस संधि से हटने का नकारात्मक असर होगा. चीन ने अमेरिका के उस बयान को भी खारिज कर दिया है जिसमें इस संधि की जगह दूसरी संधि करने की बात कही गई थी. चीन का कहना है कि वर्तमान में इस संधि को बनाए रखने की जिम्मेदारी है न कि पुरानी तोड़कर नई संधि करने की. चीन के अलावा फ्रांस और जर्मनी ने भी अमेरिका के इस कदम की कड़ी आलोचना की है. इन देशों ने भी वार्ता कर रास्ते तलाशने और मतभेद समाप्त करने की अपील अमेरिका से की है. फ्रांस का कहना है कि यह हथियार नियंत्रण संधि सामरिक स्थिरता की रक्षा के लिए बहुत उपयोगी है. फ्रांस ने रणनीतिक आयुध छंटनी संधि (Strategic Arms Reduction Treaty) को वर्ष 2021 के बाद बढ़ाने की भी अपील की है. रूस ने भी साफ कर दिया है कि अमेरिका के इस संधि से पीछे हटने के बाद या इसके दायित्वों का पालन न करने के बाद वह भी नए हथियारों का निर्माण करने से नहीं चूकेगा.क्या होगा रूस का नया प्लानरूस के रक्षा मंत्री सर्गेई शोयगू ने स्पष्ट किया है कि अगले दो सालों में रूस ने सतह से मार करने वाली नई मिसाइल बनाने का लक्ष्य तय किया है. आईएनएफ़ संधि के तहत ज़मीन से मार करने वाली मिसाइलों पर प्रतिबंध था लेकिन समुद्र और हवा से दागी जाने वाली मिसाइलों पर प्रतिबंध नहीं था. लिहाज़ा रूस के पास ऐसी मिसाइलें मौजूद हैं और वो नई प्रणाली विकसित करने में इनका इस्तेमाल कर सकता है. शोयगू ने कहा, अमेरिका पहले से ही समझौते का उल्लंघन कर रहा था. अमेरिका पांच सौ किलोमीटर से अधिक दूरी तय करने में सक्षम मिसाइल बनाने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है, जो संधि की सीमाओं के बाहर है. उन्होंने आगे कहा, इस स्थिति में रूसी राष्ट्रपति ने रक्षा मंत्रालय को जैसे को तैसा की तर्ज पर काम करने को कहा है. अमेरिका ने रूस के एलान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. दुनियाभर के जानकारों का मानना है कि इस संधि के टूटने का सबसे ज्यादा फायदा रूस को होगा. इनके मुताबिक अब रूस को मध्यम दूरी की बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें बनाने और तैनात करने से कोई नहीं रोक सकेगा. ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट में विशेषज्ञ और अमेरिकी विदेश मंत्रालय के पूर्व अधिकारी स्टीवन पिफर ने साफ किया कि रूसी अधिकारी ट्रंप की घोषणा के बाद से बहुत खुश हैं. डोनाल्ड ट्रंप ने उनकी मनचाही मुराद पूरी कर दी है. अब वे खुलेआम मिसाइलों का निर्माण भी करेंगे और संधि तोडऩे के लिए अमेरिका को कोसेंगे भी.अमेरिका इस संधि से बाहर क्यों आया?ट्रंप प्रशासन ने रूस के साथ-साथ आईएनएफ के बाहर के देशों, खास कर चीन की ओर से पैदा खतरे पर चिंता व्यक्त की है. इस संधि से खुद को अलग करते हुए अमेरिका ने कहा कि उसे इस संधि से पूरी तरह बाहर आने में छह महीने का वक्त लगेगा. राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, हम इस संधि या किसी अन्य संधि में एकतरफा रूप से बाध्य देश नहीं हो सकते. अमेरिका ने आरोप लगाया कि रूस कई तरह से समझौता उल्लंघन कर रहा है. अमेरिका ने दावा किया कि रूस की एक नई मिसाइल संधि के तहत प्रतिबंधित 500-5500 किलोमीटर की सीमा में आती है. वहीं, रूस का कहना है कि अमरीका इस संधि का उल्लंधन करता रहा है. रूस का कहना है कि वाशिंगटन झूठे आरोप लगा रहा है. वह इस समझौते से बाहर निकलना चाहता है, जिसका वो कभी हिस्सा नहीं बनना चाहता था.भारत को क्या होगा नफा-नुकसानरणनीतिकारों का मानना है कि इस समय अमेरिका चीन को साधने के लिए भारत को अपने साथ लेकर चलना चाहता है. ऐसे में यह स्थिति भारत के लिए माकूल होगी. पिछले कुछ वर्षों में चीन ने भारत के खिलाफ आक्रामक रणनीति अपनाई है. अमेरिका के संधि से हटने के बाद मिसाइलों पर रोक खत्म हो गई है. ऐसे में चीन भारत के साथ संबंध बेहतर ही रखेगा. डोकलाम विवाद के बाद चीन-भारत अपना सीमा विवाद सुलझाने वाले हैं. अगर यह संधि टूटेगी तो सबसे पहले चीन अपने नुकसान का आकलन कर सबसे पहले एक तरफ अपनी सीमा को वह सुरक्षित करेगा. यह काम वह ताइवान या जापान की तरफ नहीं कर सकता है. एसे में वह सबसे पहले भारत से अपना सीमा विवाद सुलझाना चाहेगा. अगर चीन अपनी हरकतों से बाज नहीं आता है तो ऐसी स्थिति में अमेरिका चीन को नीचे की तरफ घेरने के लिए भारत को कोई न कोई तकनीक जरूर देगा.आईएनएफ से जुड़े प्रमुख घटनाक्रम -अमेरिका ने आईएनएफ से खुद को अलग करने और अपने दायित्वों को खत्म करने की घोषणा कर दी है. इसके तहत यह निर्णय 2 फरवरी, 2019 से प्रभावी होगा और अगले छह महीने में वह संधि से हट जाएगा.-अमेरिका रूस और संधि में शामिल अन्य दलों को एक औपचारिक रूप से नोटिस देगा कि वह संधि के अनुच्छेद XV के तहत अलग हो रहा है.-अनुच्छेद XV अलग होने से पहले छह महीने की नोटिस अवधि को अनिवार्य करता है.-हालाँकि अमेरिका का यह भी कहना है कि यदि रूस आईएनएफ संधि का उल्लंघन करने वाली मिसाइलों, मिसाइल लॉन्चर और संबंधित उपकरणों को नष्ट कर दे तो संधि को छह महीने की नोटिस अवधि के दौरान बचाया भी जा सकता है.-अमेरिका के इस बयान के बाद रूस से तुरंत एक्शन लिया और स्वयं को संधि से अलग कर लिया और संधि को स्थगित कर दिया है.

Updated : 16 Feb 2019 6:55 AM GMT
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