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बिछड़े मासूमों की मसीहा रेखा मिश्रा

बिछड़े मासूमों की मसीहा रेखा मिश्रा
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आरपीएफ में बतौर उप निरीक्षक रेखा मिश्रा मात्र तीन साल की नौकरी में 953 बच्चों को उनके परिजनों को वापस सौंप चुकी हैं, जो किसी कारणवश घर से भागकर मुंबई पहुंच गए थे. किसी बच्चे के गुम होने का दर्द क्या होता है, इसे या तो वही समझ सकता है जो भुक्तभोगी है या फिर रेखा मिश्रा. रेखा मिश्रा इसलिए क्योंकि वह एक ऐसी शख्सियत हैं, जो अब तक लगभग एक हजार बिछुड़े हुए बच्चों को उनके परिजनों से मिला चुकी हैं. यह काम रेखा मिश्रा के लिए कितना मुश्किल होता होगा, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वह इन बच्चों को समझा-बुझा घर वापस परिजनों के पास लौटने को किस तरह से मनाती होंगी. वह परिजनों की पीड़ा उन बच्चों को इस तरह बताती हैं कि बच्चा स्वयं ही घर लौटने को राजी हो जाता है. उनकी मानें तो अधिकतर बच्चे असंतोष, असुरक्षा, बुनियादी जरूरतों या परिजन के दबाव के चलते घर से भागते हैं.रेखा का ताल्लुक है सैन्य परिवार सेरेखा मिश्रा (32) उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहर व कुंभनगरी प्रयाग की बेटी हैं और सोरांव तहसील के कौड़िहार ब्लॉक स्थित कंजिया गांव की मूल निवासी हैं. वह एक सैन्य परिवार से ताल्लुक रखती हैं. उनके पिता सुरेंद्र नारायण मिश्र सेना में पदस्थ थे और दादा सूर्य नारायण मिश्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. रेखा कुल सात भाई-बहन हैं, जिनमें से चार उनके भाई हैं बाकी दो बहनें. रेखा की मानें तो दादा के संस्कार का उन पर सबसे अधिक असर है. रेखा की इसी साल बीते 12 मई को शादी हुई है. उनके पति उन्नाव में जिला खाद्य अधिकारी हैं.यूं शुरू हुआ बच्चों को बचाने का सफररेखा ने परास्नातक के साथ बीएड किया है. पहले उनका चयन एक शिक्षक के तौर पर हुआ था लेकिन उन्होंने फोर्स की नौकरी को तवज्जो देते हुए 2015 में आरपीएफ ज्वाइन कर लिया. उनकी ट्रेनिंग लखनऊ में हुई. इसके बाद पहली पोस्टिंग सीधे मुंबई छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (सीएसएमटी) में हो गई. ड्यूटी के दौरान ही उन्हें घर से भाग कर मुंबई पहुंचे बच्चे मिले. यहीं से इन बच्चों को उनके परिजनों को सौंपने का उनका सफर शुरू हुआ. पिछले तीन सालों में वह 953 बच्चों को उनके परिजनों से मिलवा चुकी हैं, जिनमें 45 नाबालिग बच्चियां एवं एक मूक-बधिर बच्चा भी था. इनमें से तमाम बच्चे ऐसे थे, जो गैर हिंदीभाषी थे. उन बच्चों को उनके परिजनों से मिलाने हेतु उन्होंने दुभाषिए की मदद ली. रेखा की यह बात भी गौर करने वाली है कि उत्तर प्रदेश और बिहार के बच्चे सबसे ज्यादा घर से भागते हैं. उन्होंने जिन बच्चों को उनके परिजनों से मिलवाया, सबसे अधिक इन्हें प्रदेशों के थे.‘असंतोष, असुरक्षा, बुनियादी जरूरतों और परिजन के दबाव के चलते ज्यादातर बच्चे घर से भागते हैं. कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं, जो सोशल मीडिया के दोस्तों और फिल्मी सितारों से मिलने का चाहत में मुंबई पहुंच जाते हैं.’-रेखा मिश्रा ड्यूटी से अधिक करती हैं कामवर्तमान में रेखा मुंबई के प्रसिद्ध छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (सीएसएमटी) पर कार्यरत हैं. उनकी ड्यूटी अमूनन आठ घंटे की होती है, लेकिन वह जूनून के चलते 10 घंटे काम करती हैं. इस दौरान उनकी नजरें डरे-सहमे लोगों को ढूढ़ती हैं. रेखा ‘उदय सर्वोदय’ से बताती हैं, ‘सीएसएमटी की भीड़ को नियंत्रित करना हो या बच्चों व महिलाओं की सुरक्षा, इसकी जिम्मेदारी आरपीएफ पर है. मैं इसी टीम का एक हिस्सा हूं. चूंकि ये टर्मिनस आखिरी है, इस कारण घर से भागे हुए बच्चे इसी स्टेशन पर उतरते हैं और मुझे मिल जाते हैं.’ रेखा के अनुसार, फिलहाल यह उनकी टीम ही सुनिश्चित करती है कि ऐसे बच्चे (खासकर आसानी से फुसलाए जाने वाले) गलत हाथों में पहुंचकर परेशानी में न पड़ जाएं इसलिए उनका ध्येय इन बच्चों को उनके परिवार से मिलाना होता है.उपलब्धियां एवं पुरस्काररेखा को महिला व बाल विकास मंत्रालय की ओर से 2017 का नारी शक्ति पुरस्कार प्रदान किया गया है. इसके साथ फिक्की ने भी उन्हें स्मार्ट पोलिसिंग पुरस्कार से नवाजा है. सबसे बड़ी बात यह कि मुंबई में बाल-सुरक्षा के लिए किए गए उनके कामों को महाराष्ट्र के उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों की पुस्तकों में अब पढ़ाया जाएगा. मध्य रेलवे के महाप्रबंधक डीके शर्मा का मानना है कि पाठ्यक्रम में उन्हें शामिल करने से नई पीढ़ी जरूर प्रेरित होगी.

Updated : 2 Oct 2018 6:13 AM GMT
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