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जीवन में धक्के का महत्व

जीवन में धक्के का महत्व
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आशीष तिवारी निर्मल

व्यंग्य: मनुष्य तन सौभाग्य से मिलता है और मनुष्य तन में धक्का परमसौभाग्य से मिलता है। जीवन जीने के लिए प्राणवायु की आवश्यकता होती है। ठीक इसीतरह जीवन में आगे बढ़ने के लिए धक्के की जरूरत होती है। हालांकि बदलते समय मेंधक्के के मायने बदल गए। एक सर्वे के मुताबिक, सर्वाधिक धक्केआगे बढ़ाने के लिए नहीं अपितु पीछे धकेलने या गिराने के लिए दिए जाते हैं। धक्कम-धक्काईकी यह परम्परा सदियों पुरानी है। ऐसे मनुष्य विरले ही मिलेंगे, जिन्होंने जीवन में धक्का ना खाया हो...।

धक्के का महत्वराष्ट्रव्यापी नहीं अपितु विश्वव्यापी है। वैसे धक्का शब्द सुनते ही हम सब को भरी हुई सरकारी बस, ट्रेनों की याद आजाती है। बस या ट्रेन के दरवाजे पर पैर टिकाने की जगह मिल जाए तो आदमी को पता नहींचल पाता कि धक्कों की विशेष कृपा सेकब बस या ट्रेन के अंदर खड़े मिलते हैं। मुझे याद है जीवन में पहली बार धक्का तबखाया था जब शुरुआती दिनों में बीएसएनएल की सिम खरीदने लाईन में लगा था। लात-घूँसोंकी अपार कृपा बरसी थी हम पर, फिर भी सिम नहीं मिल पाई तो मन को धक्का लगा।

आज के दौर मेंज्यादातर धक्का, धक्का-मुक्की फिर लात घूँसों में बदल जाता है। धक्के लगनेका अपना अलग सुख भी है। स्कूल-कॉलेज में किसीलड़के का धक्का किसी लड़की को लग जाए तो परिणाम सुखद या दुखद दोनों मिल सकते हैं। मामला'शौरी' शब्द से पट गया तो ठीक, वरना कभी-कभी खामियाजा शादीतक जा पहुंचता है। वैसे शादी तो ऐसी रस्म है जिसमें धक्के तो नहीं होते लेकिन शादीके भंवरजाल में फंसकर सारी उम्र धक्के खाने पड़ते हैं। जैसे पत्नी का नाम राशनकार्ड में चढ़वाने के लिए सरकारी दफ्तर के धक्के, बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र के लिए अस्पताल के धक्के, फिर बच्चों कीशिक्षा के लिए स्कूल के धक्के। फिर बच्चों की नौकरी लगवाने के लिए जोर आजमाईशधक्के। जीवन के बचे हुए दिन में धक्का मारने की जिम्मेदारी को ऑफिस के अधिकारी या बाबू बखूबी निभा देते हैं।

रिटायर होने केबाद घर बैठी निकम्मी संतान के धक्के। पेंशन कॉपी बनवाने और बैंक से वृद्धा पेंशन पाने के लिएधक्के। बीमारी के दौरान इलाज के लिए अस्पताल में डाक्टर्स के धक्के, बीमारी से बच गये तो ठीक वरना फिर यमराज केधक्के। ये धक्के शमशान में भी पीछा नहीं छोड़ते, मरने के बादमुखाग्नि देने के बाद कुछ लोग लंबे बांस की लकड़ी लेकर मुस्तैद खड़े रहते हैं किकहीं कोई शरीर का अंग जलने से शेष ना रह जाए। फौरन धक्का देकर आग के हवाले करतेहैं। अत: धक्के के बिना जीवन अधूरा है,

जीवन की कल्पनाधक्के के बिना अधूरी है, इसलिए जीवन मेंजितना भी धक्का मिले उसे हंसते हुए झेलते जाएं। जीवन में बढ़ते जाएं, धक्का दें और खुद भी खाते जाएं। आजादी के बाद से अपना वतनभी धक्के पर धक्के खाकर आगे बढ़ रहा है। यदि आपने जीवन में धक्का नहीं खाया है तो आज हीखाएं।

Updated : 30 Sep 2020 12:22 PM GMT
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