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व्यंग्य: मातृभाषा बनाम मात्र नब्बे घंटे...!

व्यंग्य: मातृभाषा बनाम मात्र नब्बे घंटे...!
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अलंकार रस्तोगी

उन्होंने हिंदी भवन केठीक सामने लगे ‘मात्र नब्बेदिनों में फर्राटे से अंग्रेजी बोलना सीखें’ वाले होर्डिंग को देखा। विज्ञापन में एक अति सूक्ष्म ‘स्कर्ट’ पहने एक नव यौवना अंग्रेजी के ‘वी’ अक्षर को अपनीसुकोमल उँगलियों से बनाते हुए अपने अंग्रेजी बोलने के आत्मविश्वास को दर्शा रही थी।उसे देखते ही उनके अन्दर उसी ग्रंथिरस का स्राव होने लगा जो किसी लैला को देखते हीकिसी छैला को होना लगता है।

महोदय उसविज्ञापन के दर्शन और प्रदर्शन से खासे प्रभावित हुए। जिस कथित सुसंस्कृत देश मेंअंग्रेज़ी बोलने वाले को ही सभ्य होने का लाइसेंस प्राप्त हो, उस देश में ऐसे भागीरथी विज्ञापनों से सभ्यता की गंगा धरतीपर उतरती देश के हर कोने में पायी जा सकती है। उन्होंने अपने हिंदी माध्यम वालेझंझावातों की वैतरणी को पार लगाने के लिए उस विज्ञापन में ईश्वरीय अनुकम्पा कीअनुभूति की।

हिंदी माध्यम सेपढ़ाई करने के कारण वह अभी तक इस कथित हिंदी भाषी राष्ट्र में ही शरणार्थी की तरहअनुभव कर रहे थे। हिंदी भाषा पर उन्हें गर्व था लेकिन वही गर्व उन्हें कई बारनौकरियों के साक्षात्कार से बाहर का मार्गदर्शन कराने के ही काम आया था। आज वहविज्ञापन उन्हें इस देश की विधिवत नागरिकता प्रदान करने में आशा की एक किरण बननेजा रहा था। अब महोदय ने ठान लिया था कि उस अंग्रेजी सिखाऊ संस्थान में प्रवेश लेकरवह अपने जीवन के ‘नब्बे घंटो’के निवेश से सुनहरे भविष्य में प्रवेश करजायेंगे।

उन्होंने उससंस्था की ओर रुख किया। दरवाजे पर खड़ा एक दरबान सरीखा इंसान किसी भिखारी की माता–बहनों का ठेठ हिंदी में स्तुति वंदन कर उसे भगारहा था। उन्हें देखते ही वह ‘पुनः मूषक भवः’की भांति ‘वेलकम सर’ कहते हुए दरवाज़ेको खोलने लगा। सामने स्वागत की मुद्रा में एक ‘एयर होस्टेस’ रूपेण बाला कुछ उत्कृष्ट और असमझनीय अंग्रेजी के वाक्यों को बोलने लगी जोअंग्रेजो के उस काल खंड की याद दिलाने लगा, जिसे हटाने केलिए हमारे पूर्वजों ने न जाने कितनी कुर्बानियां दी थी। जब उस बाला ने इन जनाब कोअपने अंग्रेजी के मंतर से वश में कर लिया तब उसकी अग्रेज़ी का नशा छू हुआ और वह खुदपर हिंदी उतर आई। वैसे भी किसी को समझाने में अभी भी हिंदी का कोई सानी नहीं है।

अब वह पूरे दसहज़ार रुपये के बदले अपने अंग्रेजीकरण के लिए तैयार किये जा चुके थे। दस हज़ार रुपयेकी अग्रिम राशि देकर उनके मन में अंग्रेजी के प्रति अगाध श्रद्धा और उत्साह बढ़ गयाथा। वह उस दिवा स्वप्न में खो चुके थे, जब उनका खांसना और छींकना तक अंग्रेजी में हुआ करेगा। वह अबकिसी उच्च स्तर के कथित समाज में हिंदी बोलने के कारण हीन भावना शिकार नहीं होंगे।उन्हें किसी भी साक्षात्कार में अब '‘गेट आउट’ वाला परम्परागतवाक्य नहीं सुनने को मिलेगा।

उनकी कोचिंग जारीहै। वह प्रतिदिन हिंदी भवन के सामने स्थित अपनी कोचिंग में किसी योद्धा की भांतिप्रवेश करते हैं। आज हिंदी भवन के पास पहली बार कुछ हलचल हो रही है। लगता है आज ‘हिंदी दिवस’ है। चाय का मुफ्त स्टाल भी लगा है। हिंदी की बलिहारी केकारण आज उन महोदय की चाय वहीं होगी।

(लेखक वरिष्ठ व्यंग्यकारहैं)

Updated : 14 Sep 2020 11:37 AM GMT
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