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सतीर्थराजो जयति प्रयाग:

सतीर्थराजो जयति प्रयाग:
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इतिहासकारों की मान्यता है कि अकबर ने गंगा-यमुना के संगम-तट पर जो नगर बसाया था, उसका पुराना नाम पयाग (प्रयाग) था. उसे हिंदू लोग तीर्थराज के रूप में मानते हैं. अकबर के काल में कुछ लोग उसे ‘इलाहाबास’ कहते थे और अधिकतर लोग ‘इलाहाबाद’ का उच्चारण करते थे. अकबर ने इसे ताड़ लिया और आगे चलकर, उसने ‘इलाहाबास’ से ‘इलाहाबाद’ कर दिया था, जो कि जनसामान्य ने स्वीकार कर लिया; और अब उत्तर प्रदेश-शासन की ओर से इलाहाबाद को प्रयागराज कर दिया गया है.लेख ¦ डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय

श्रुति: प्रमाणं स्मृतय: प्रमाणं, पुराणमष्यत्र परं प्रमाणं।

यत्रास्ति गंगा यमुना प्रमाणं, सतीर्थराजो जयति प्रयाग:।।

(जिसकी महत्ता के विषय में वेद प्रमाण हैं और पुराण तो सबसे बढ़कर प्रमाण हैं तथा गंगा-यमुना प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, उस तीर्थराज प्रयाग की जय हो.)

गोस्वामी तुलसीदास ‘श्री रामचरित मानस’ में कहते हैं:-

तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत जन्म कोटि अघ भागा।।

वस्तुत: प्रयाग-क्षेत्र की महत्ता मनुस्मृति, पुराण, श्री रामचरित मानस, वाल्मीकि रामायण, महाभारत, कालिदास-विरचित ‘रघुवंशम्’, विलहण-कृत ‘विक्रमांकदेव’, सुबन्धु-रचित ‘वासवदत्ता’ आदिक कई ग्रंथों में उपलब्ध होती है. ‘मत्स्यपुराण’ के अनुसार, प्रयाग-मण्डल का विस्तार 20 कोस बताया गया है. ‘कूर्मपुराण’ में कहा गया है कि प्रयाग-क्षेत्र का परिमाप छ: हजार धनुष है. इसी पुराण के चौंतीसवें और बयासीवें अध्यायों में प्रयाग नाम से ब्रह्मा के क्षेत्र को पांच योजन तक विस्तृत बताया गया है. ‘पद्मपुराण’ के ‘स्वर्गखण्ड’ में प्रयाग के क्षेत्र का पांच योजन और छ: कोस तक का विस्तार है. इसी पुराण के अट्ठावनवें अध्याय में प्रयाग की लंबाई-चौड़ाई डेढ़ योजन बताई गई है, जिसमें छ: किनारों का उल्लेख है. ‘पद्मपुराण’ के ‘पातालखण्ड’ से ज्ञात होता है कि समस्त तीर्थों की तुलना में प्रयाग की महिमा तोल कर आंकी गई है. समस्त अलौकिक देविगण के आग्रह पर शेषनाग ने एक तुला पर तोल कर यह निर्णय किया गया था कि प्रयाग समस्त तीर्थों में सर्वोपरि है. ‘प्रयाग’ की निष्पत्ति यज् धातु से होती है। ‘प्र’ उपसर्ग प्रकृष्ट, श्रेष्ठ, उत्कृष्ट है तथा ‘याग’ शब्द यज्ञवाची है.रामायण, महाभारतकाल तथा मुगल-बादशाह अकबर के समय के ग्रंथों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि उत्तर प्रदेश का जो प्रमुख जनपद कल तक ‘इलाहाबाद’ होता था, वह आज ‘प्रयागराज’ हो गया है. हम यदि मनुस्मृति, महर्षि वाल्मीकि-कृत रामायण और वेदव्यास-रचित महाभारत आदिक पौराणिक ग्रंथों पर दृष्टि-निक्षेपण करते हैं तब विदित होता है कि रामायण-महाभारतकाल के पूर्व और वैदिक काल के पश्चात ‘प्रयाग’ का नामकरण हुआ था. वेदों का काल लगभग 5000 वर्ष ईसा-पूर्व और रामायण-महाभारतकाल लगभग 3000 वर्ष ईसा-पूर्व माना जाता है. इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्रयाग का नामकरण 5000 वर्ष ईसा-पश्चात और 3000 वर्ष ईसा-पूर्व किया गया था. रामायण के ‘आदिपर्व’ में सोम, वरुण तथा प्रजापति नामक देवगण का जन्म प्रयाग में होने का उल्लेख है. महाभारत में दुर्योधन ने पाण्डवों के वनवास के समय उन्हें लाख से बनवाए घर प्रयाग में स्थित लाक्षागृह में जलाकर भस्म करने की योजना बनाई थी. महाभारत के ‘वनपर्व’ के अनुसार, यहीं पर प्रतिष्ठानपुर (झूसी) हंसप्रपतन, भोगवती, वासुकि (नागवासुकि) दशाश्वमेध (दारागंज), त्रिवेणी संगम, वेणीमाधव, सोमेश्वर तीर्थ, भरद्वाज आश्रम तथा अक्षयवट नामक मुख्य तीर्थस्थल हैं. प्रयाग वही महास्थान है, जहां शिव, ब्रह्मा, इंद्र, यम, वरुण, अग्नि, भरद्वाज, अत्रि, अनुसुइया दुर्वासा, मनु, पराशर आदिक देव, विदुषी तथा मुनिगण ने यज्ञ किए थे. इनके अतिरिक्त यहां के अधिपति अश्वमेध, वाजपेय यज्ञादिक करते थे, जिसके कारण इसका नाम ‘प्रयाग’ किया गया था. इस प्रयाग शब्द में ही इसके नाम की सार्थकता दिख रही है.
मनुस्मृति के अनुसार, हिमवद्विन्ध्योर्मध्ये, यत्प्राग्विनशनादपि। प्रत्यगेव प्रयागच्च, मध्यदेश: प्रकीर्तित:।।
(हिमालय और विन्ध्यांचल के मध्य उस स्थान से जहां सरस्वती विलुप्त हो जाती है और प्रयाग के पूर्व जो देश है, उसे ‘मध्यदेश’ कहते हैं; अर्थात प्रयाग मध्यदेश की पूर्वान्त-सीमा प्रदेश था.) आदिकवि वाल्मीकि कृत रामायण के ‘अयोध्याकाण्ड’ के चौवनवें सर्ग में एक वर्णन मिलता है:- राम एक घने वन से निकलकर उस देश (स्थान) में पहुंचे थे, जहां दो नदियों- गंगा-यमुना का संगम था. राम ने लक्ष्मण से कहा था- हे सौमित्र! देखो, यही प्रयाग है; क्योंकि यहां मुनियों-द्वारा किए गए अग्निहोत्र का सुगंधित धुआं उठ रहा है. यहीं वे भरद्वाज मुनि के आश्रम में ठहरे थे. उसके बाद भरद्वाज मुनि ने प्रयाग से चित्रकूट जाने का मार्ग बताया था. इतना ही नहीं, रामचंद्र, सीता तथा लक्ष्मण को वापस लाने के लिए भरत ने जब चित्रकूट के लिए प्रस्थान किया था तब वे सबसे पहले प्रयाग-स्थित भरद्वाज मुनि के आश्रम में पहुंचे थे. प्रयाग में ही एक ऐसा स्थान है, जो अत्रि मुनि और उनकी पत्नी अनुसूया के नाम पर अतरसुइया के नाम से प्रसिद्ध है.
अब आइए! प्रयाग की ऐतिहासिक सम्बद्धता को समझें :-
प्रयाग-जनपद का इतिहास हमें बौद्धकाल में प्राप्त होता है. चंद्रगुप्त मौर्य ने जब समस्त उत्तर भारत पर अपना आधिपत्य कर लिया था तब प्रयाग भी उसमें सम्मिलित था. ह्वेनसांग नामक चीनी यात्री जब भारत आया था तब उसने अपनी पुस्तक ‘सी यू की’ में प्रयाग का नाम अपनी लिपि में ‘पो-लोये-क्रिया’ लिखा था. उसके अनुसार, प्रयाग नगर में दो नदियां हैं. प्रयाग दो नदियों के मध्य 20 ली घेरे में है. 5 ली 1 मील के बराबर है. बौद्ध, पालि-साहित्य में ‘प्रयाग तित्थ’ (प्रयाग तीर्थ, प्रयाग प्रतिट्ठान, प्रयाग प्रतिष्ठान तथा प्रयाग) के नाम का उल्लेख है. तथागत गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश में कहा है, मज्झिम निकाय। वत्थ सुत्तन्त। (क्या करेगी सुन्दरिका. क्या प्रयाग और क्या बाहुलिका नदी.)प्रयाग के अस्तित्व को मुगल-काल में भी स्वीकार किया गया था. अकबरकालीन तीन इतिहासकार- बदायूंनी, अबुल फजल तथा निजामुद्दीन अहमद ने ‘प्रयाग’ (प्रयाग) नगर के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए बताया है कि नवंबर, 1583 ई० में फतेहपुर सीकरी से तीन सौ नौकाओं का बेड़ा लेकर यमुना नदी से होकर अकबर ‘पयाग’ (प्रयाग) पहुंचा था, जहां उसने गंगा-यमुना के संगम-तट पर एक बहुत बड़े किले की नींव डलवाई थी. अकबरकालीन इतिहासकारों की मान्यता है कि अकबर ने गंगा-यमुना के संगम-तट पर जो नगर बसाया था, उसका पुराना नाम ‘पयाग’ (प्रयाग) था. उसे हिंदू लोग ‘तीर्थराज’ के रूप में मानते हैं. अकबर ने प्रयाग का नाम ‘इलाहाबास’ (अल्लाह+बास) = अल्लाह का वास (ईश्वर का वास-स्थान) रखा था. अकबर ने इलाहाबाद के किले में जो सिक्के ढलवाए थे, उन पर ‘इलाहाबास’ उत्कीर्ण है. कोलकाता के संग्रहालय में इलाहाबास नाम से अंकित सोने की दो मोहरें अस्सी के दशक में इस लेखक को देखने का अवसर मिला था. अकबर के काल में कुछ ही लोग ‘इलाहाबास’ कहते थे और अधिकतर लोग ‘इलाहाबाद’ का उच्चारण करते थे. अकबर ने इसे ताड़ लिया और आगे चलकर, उसने ‘इलाहाबास’ से ‘इलाहाबाद’ कर दिया था.तब से इलाहाबाद को जनसामान्य ने प्रत्येक स्तर पर स्वीकार कर लिया था; और अब उत्तर प्रदेश-शासन की ओर से इलाहाबाद को प्रयागराज करने का आदेश प्रसारित कर दिया गया है। वास्तव में, प्रयाग, पयाग, इलाहाबास, इलाहाबाद तथा प्रयाग के आध्यात्मिक और ऐतिहासिक यात्रा-मार्ग अत्यंत रोचक और शोधपरक हैं।

(लेखक भाषाविद्-समीक्षक हैं)

Updated : 17 Nov 2018 8:17 AM GMT
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