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गुलाम दोस्त और स्वतंत्र संडे

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कटाक्ष ¦ अशोक गौतमस्वतंत्र संडे शुरू हो गया है दोस्त! अभी स्वतंत्र संडे की रात चल रही है. स्वतंत्र संडे के सूरज की पहली किरण से पहले तेरे पास. हफ्ते में एक दिन तो संडे आता है कम्बख्त. हफ्ते भर की भड़ास निकालकर ही चैन लेंगे अबके.


कल जिगरी दोस्त का फोन आया था. सीधा प्वाइंट पर आते बोला, ‘कल संडे है, खूब धमाचौकड़ी करेंगे. कांवड़ियों वाली. न नियम न उप नियम. तबाही मचा देंगे. हफ्ते भर की भागदौड़ को एक ही दिन में गुलाल सा उड़ा देंगे.’उसकी बात सुन मैं भी स्वतंत्र संडे के बारे में सोचने लगा. जिंदा आदमी को कम से कम हफ्ते में एक दिन तो झंझटों से मुक्त हो ही जाना चाहिए.रात को जैसे ही झंझटों की सुइयां बारह बजे के पार हुर्इं तो मैं चहका, ठीक वैसे ही जैसे देश आजाद होने पर पहली बार चहका होगा! बिस्तर में से खुद से भी छुपकर उसे फोन मिलाया, ‘क्या कर रहा है?’‘करना क्या! स्वतंत्र संडे शुरू हो गया है दोस्त! अभी स्वतंत्र संडे की रात चल रही है. स्वतंत्र संडे के सूरज की पहली किरण से पहले तेरे पास. हफ्ते में एक दिन तो संडे आता है कम्बख्त. हफ्ते भर की भड़ास निकालकर ही चैन लेंगे अबके. नींद तो नहीं आएगी. पर चल सो जा. न आए तो सोने का नाटक कर लेना. रात मजे से कट जाएगी. लोग तो नाटक करते-करते उम्र गुजार लेते हैं.’ उसने मुझे अपनी बेचैनी दबाने की तमाम हिदायतें दीं और फोन काट दिया था.शेष रात स्वतंत्र संडे के प्रोग्राम के सपने लेते-लेते जैसे-तैसे कटी. सुबह उठा तो बिस्तर में से ही उसे स्वतंत्र संडे की बधाई देने को कॉल मिलाया. एक बार, दो बार, चार बार... पर उसका फोन ही नहीं मिला. लाइट जला सिगनल देखा. मेरे पास तो था, हो सकता है वह रेंज में न हो. आजकल आदमियों के चरित्र और मोबाइल के सिगनल के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. दोनों अपनी मर्जी के.सुबह की किरण से पहले आने वाला पूरा सूरज निकलने के बाद भी नहीं आता दिखा था तो परेशानी बढ़ी. सौ बार फोन लगाए. हर बार नॉट रिचेबल. वक्त पर जरूरत पड़ने वाले दोस्तों की तरह. जब उसका इंतजार करते थक गया कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. दरवाजा खोला तो सामने गधा. चेहरे पर अभी भी अंग्रेजों के समय सी गुलामी.‘क्यों? क्या हो गया था? ये क्या हाल बना रखा है? तू आया तो मेरे घर संडे आया...’ मैं उसके गले लगा तो वह परेशान हो बोला, ‘यार! मेरे मोबाइल को पता नहीं क्या हो गया.’‘क्या हो गया तेरे मोबाइल को?’ यक्ष प्रश्न! आज की तारीख में बंदा जीता ही मोबाइल के आसरे है.‘साली बैटरी एकदम धोखा दे गई. प्रेमिका को पहले से बेहतर प्रेमी मिलने की तरह.’‘तो?’‘तो क्या? चार्जर है तेरे पास? नहीं तो...’ उसने द्वार पर खडेÞ-खडे ही पूछा.‘हां है! पर भीतर तो आ?’‘पहले चार्जर दे. ये चार्ज हुआ तो समझो मैं चार्ज हुआ.’ सच कहो तो आज के आदमी की बैटरी मोबाइल के चार्ज रहने तक ही चार्ज रहती है. मोबाइल की बैटरी गई तो बंदे की पहले ही गई.मैं बदहवास सा भीतर गया और आनन-फानन में अपने मोबाइल का चार्जर ले आया. उसने दरवाजे पर खडेÞ-खडेÞ ही उसे अपने मोबाइल के पीछे लगाया कांपते हाथों से.‘थैंक गॉड! लग गया.’ उसकी जान में जान आई, ‘ओफ्फ यार! मैं तो डर ही गया था कि जो मोबाइल में तेरे वाला चार्जर न लगा तो...’ उसने ऊपरवाले का धन्यवाद करते हुए कहा तो मैंने हंसने का अभिनय करते पूछा, ‘तो क्या करता?’‘क्या करता! लौट जाता इन्हीं पांव, मोबाइल चार्ज करने. दोस्त! आज जिंदगी हर वक्त चार्ज हो या न हो पर मोबाइल हर वक्त चार्ज रहना चाहिए. अच्छा बोल, हॉट स्पॉट तो है न तेरे पास? आधे घंटे से व्हाट्सएप नहीं देखा. ये साला नेट भी न!’ इससे पहले कि मैं उसके गले लग उसे इंडिपेंडेंट संडे की बधाई देता, आज के इंडिपेंडेंट प्रोग्राम के बारे में कुछ कहता, वह मेरे मोबाइल में झांकता बोला, ‘तो नेट आॅन कर दे अपना. कोई पासवर्ड तो नहीं है न? होना भी नहीं चाहिए. भूसे के भाव नेट मिलने पर होना भी नहीं चाहिए. मैंने अपने मोबाइल में नेट आॅन किया तो वह वहीं खडेÞ-खडेÞ फेसबुक पर मुस्कुराते हुए जुट गया. मैंने कहा, ‘भीतर तो चल!’‘ठहर जा बीस फ्रेंड रिक्वेस्ट आए हैं. ऐसे कैसे यार? इन्हें ओके करने के बाद ही....आग थोडेÞ ही लगी है जो... और हां! मेरा पावर बैंक चार्जिंग में लगा दे जरा...’ कह उसने स्वतंत्रता की अपने से भी कई गुणा लंबी सांस ली.

Updated : 11 Oct 2018 3:00 PM GMT
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