Top
Home > Magazine > सामाजिक न्याय और गांधी

सामाजिक न्याय और गांधी

सामाजिक न्याय और गांधी
X

विमर्श ¦ कुमार शुभमूर्तिमहात्मा गांधी एक न्यायपूर्ण समाज व्यवस्था बनाना चाहते थे. उनका हरिजन आंदोलन जातीय या वर्गीय न होकर संपूर्ण समाज के बदलाव के साथ जुड़ा था. गांधी का सामाजिक न्याय का संघर्ष जो अफ्रीका में भारतीय ‘कुली’ के साथ शुरू हुआ था, हमेशा एक नई दुनिया बनाने के सपने से जुड़ता है.


आज के राजनैतिक माहौल में सामाजिक न्याय की बात उठते ही हमारे सामने ‘आरक्षण’ की बात आ जाती है. आरक्षण, जिसे हमारे देश के संविधान में जाति के आधार पर निर्धारित किया गया है. यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि भारतीय समाज में जाति के आधार पर तथाकथित निचली जातियों को हर तरह से दबाकर रखा गया है. इन जातियों के लोग जन्म के आधार पर ही नीचे माने गए और इसी नीचे माने जाने के कारण अनेक अधिकारों से वंचित रखे गए. जातियों की श्रेणीबद्ध कतार में जो जातियां सबसे नीचे ठेल दी गर्इं, उन्हें लगभग पशु तुल्य ही समझा गया. देश के अनेक भागों में कहीं उन्हें वनमानुष कहा जाता था; कहीं उन्हें कठोर शारीरिक श्रम के बदले मवेशी के ‘गोबर’ मजदूरी में दिए जाते थे ताकि वे उस अनपचे अनाज के दाने धोकर निकाल लें और पेट भर सकें; कहीं कपड़ा धोने वाली जातियां दिन भर गांव से दूर अपनी झोपड़ियों और झाड़ियों में छुपी रहती थीं और रात के अंधेरे में छुपकर आती थीं ताकि ये गांव की उच्च जातियों के कपड़े धोने के लिए ले जा सकें और इन्हें कोई देख न सके. ऐसी अनेक सच्ची और अकथ कहानियां इन दलित जातियों के साथ जुड़ी हैं, जिन पर आज की पीढ़ी मुश्किल से विश्वास कर पाएगी. इन जातियों को ऊपर उठाकर अन्य जातियों के बराबर लाना है, इस बात के लिए गुलामी के जमाने से ही प्रयास किए जाने लगे. जातियों को दबाकर रखने के अनेक तरीके थे तो उठाने के भी अनेक तरीके होना लाजमी था. महाराष्ट्र के संत ज्ञानदेव-नामदेव रहे हों, महात्मा फुले और उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले रही हों या फिर हिंदी क्षेत्र के संत कबीर या रविदास रहे हों, इन सबने अपनी-अपनी तरह से दलितजनों को मुनष्य को गरिमा दिलाने की कोशिश की.दलित मुक्ति का संघर्षभारत के आधुनिक इतिहास में तीन नाम ऐसे हैं, जिन्हें दलित मुक्ति के संघर्ष और सामाजिक न्याय की स्थापना की ‘जद्दोजहद के प्रतीक’ कहा जा सकता है. ये तीन नाम हैं- गांधी, अंबेडकर और तमिलनाडु के ई. रामास्वामी नायकर जिन्हें प्यार से लोग ‘पेरियार’ भी कहते हैं. आज ये तीनों जीवित नहीं हैं, लेकिन इन्होंने दलित जातियों के लिए सामाजिक न्याय की जो अलग-अलग धाराएं बनार्इं, वो आज तेजी से प्रवाहमान हैं. प्रारंभ में अंबेडकर और पेरियार दोनों अलग-अलग तरीके से गांधी के आंदोलनों से जुड़े थे, परंतु शीघ्र ही अपनी-अपनी सोच और अनुभवों के कारण ये गांधी के आंदोलन से अलग हो गए और दलित संघर्ष की अपनी धारा को मजबूत बनाने में लग गए.गांधी ने अंबेडकर को आगे कियाडॉ. भीमराव बाबा साहब अंबेडकर प्रसिद्ध न्यायविद् और वकील के रूप में स्थापित थे. जब भारत आजाद हुआ तो आजादी का एक बड़ा मकसद था समाज में न्याय की स्थापना करना. इस काम में आजाद भारत के संविधान और कानून की भी पूरी ताकत लगनी थी. संविधान और कानून का स्वरूप भी सामाजिक न्याय की मांग को पूरा करने वाला बनना चाहिए था. इसीलिए गांधी ने डॉ. अंबेडकर का नाम संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष के रूप में सुझाया था. अंबेडकर ने भी इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और ‘संविधान निर्माता’ कहलाए. इसी संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया, जो सिर्फ अनुसूचित जातियों के लिए 25 प्रतिशत का था. इस अनुसूचित जातियों में वे 24 जातियां थीं, जिन्हें अंबेडकर ‘दलित’ कहते थे और गांधी ‘हरिजन’. अपने ही कर्तव्य के बल पर नहीं, बल्कि आरक्षण का सहारा लेकर दलित जातियां आगे बढ़ें, यह स्वाभिमानी अंबेडकर की नजर में बहुत अच्छा नहीं था, पर आम राय को देखते हुए उन्होंने इसे 10 वर्ष के लिए सीमित कर दिया. यदि तब तक जाति के आधार पर सामाजिक बराबरी का माहौल नहीं बनता है तो आरक्षण की समय सीमा और बढ़ाई जा सकती है, ऐसा प्रावधान भी कर दिया गया.लेकिन यह बात आईने की तरह साफ है कि अच्छा या बुरा कोई कानून समाज पर लादा नहीं जा सकता, जब तक कि जनमानस उसे स्वीकार कर लेने के लिए तैयार न हो. समाजोत्थान के अनेक कानूनों की तरह आरक्षण कानून का भी हाल बहुत अच्छा नहीं रहा. न्यूनतम शिक्षा के अभाव में अनुसूचित जातियां उसका लाभ नहीं उठा सकीं; गरीबों के प्रतिकूल शिक्षा प्रणाली का लाभ दलित नहीं उठा पाया; अंग्रेजी के बोलबाले ने आम स्कूलों में पढ़ने वाले आम छात्रों को आगे बढ़ने नहीं दिया. औद्योगीकरण के आदर्श ने पूरे ग्रामीण समाज को, जो खेतिहर था, उन्नत नहीं होने दिया. आरक्षण का कानून दलितों, हरिजनों को ऊंचा उठाकर समाज के अन्य तबकों की बराबरी में लाने में मददगार हो सके, इसके लिए कानून से अलग एक ऐसे आंदोलन की आवश्यकता थी जो भारत के आम समाज को शिक्षा, समृद्धि और सुसंस्कृति के लिए प्रेरित करता. ऐसा कोई आंदोलन खड़ा नहीं हो सका. गांधी की हत्या कर दी गई, नेहरू राज्य सत्ता के ढांचे में समा गए, अंबेडकर जब तक इस ढांचे से बाहर निकले तो उन्हें बीमारी ने घेर लिया. संविधान तैयार होने के क्रम में जो बहस चली और फिर कानून मंत्री के रूप में औरतों के लिए संपत्ति के अधिकार को लेकर उनके कठिन प्रयासों को जो असफलता मिली, उससे उन्हें बहुत धक्का लगा और हिंदुत्व से लड़ाई छोड़ 1954 में वह बौद्ध धर्म की शरण में चले गए.राजनीति का मोहरा बन गई आरक्षण की नीतिजाति तोड़ने और अंतिम जन को आगे बढ़ाने के किसी व्यापक आंदोलन के अभाव में आरक्षण की नीति, राजनीति का मोहरा बन गई और दस वर्ष तक तो क्या आरक्षण की नीति आज भी जिंदा है. बाद की राजनीति ने ‘मंडल कमीशन’ को आधार बनाकर दलितों-हरिजनों के अलावा पिछड़ी जातियों को भी आरक्षण दिया, परंतु उसी राजनीति ने मुसलमानों की अत्यंत दयनीय श्रेणी के लोगों को आरक्षण देने से मना कर दिया. इसके लिए तथाकथित मुस्लिम राजनीति भी जिम्मेदार है. मुस्लिम राजनीति यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि मुस्लिम समाज में भी जातिगत श्रेणियां बन गई हैं. हिंदू समाज की जिन जातियों के लोगों ने विभिन्न कारणों से धर्म परिवर्तन कर इस्लाम धर्म कबूल किया, मुस्लिम समाज में उनकी सामाजिक हैसियत वही बनी रही. दलित, हिंदू, मुस्लिम समाज में भी दलित ही माने गए. इस्लाम धर्म के आका बने लोग जाति के इस तथ्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं. पसमांदा मुसलमानों का जो आंदोलन अली अनवर चला रहे हैं, उसे और सशक्त बनाने की जरूरत है जिससे कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट का पूरा फायदा उठाया जा सके.अब कठघरे में एससी/एसटी एक्टसामाजिक न्याय की लड़ाई के लिए एक दूसरा कानून भी है जो बोलचाल की भाषा में एससी/एसटी एक्ट के रूप में प्रसिद्ध है. इस कानून की ‘जान’ यह क्लॉज है कि आरोपित व्यक्ति को गिरफ्तार होना ही है, भले उसके बाद न्यायालय उसे जमानत दे दे या बरी कर दे. हाल में न्यायालय ने इस क्लॉज को हटा दिया था. बहाना यह था कि इस कानून का बहुत दुरुपयोग होता है और बहुत सारे निरपराध गिरफ्तार कर लिए जाते हैं. बलात्कार के मामले में भी ऐसे ही दुरुपयोग की बात कही जाती है. न्यायालय यहां समाज की इस सच्चाई को भूल जाता है कि परेशान किए जा रहे निरपराध लोगों की तुलना में उन अपराधियों की संख्या बहुत बड़ी है, जो इस कड़े प्रावधान के बावजूद समाज में अपनी मजबूत स्थिति का और आरोपकर्ता की कमजोर ओर निम्न स्थिति का भरपूर फायदा उठाते हैं और अपराध करते रहने के बावजूद कानून के शिकंजे से बाहर अपना खेल खेलते रहते हैं. सरकार ने फिर पुरानी स्थिति बहाल कर, सामाजिक वास्तविकता के अनुरूप सही कार्य किया है. निरपराध झूठे आरोपों के आधार पर परेशान न किए जाएं, इसके लिए कुछ ऐसे प्रावधान ढूंढ़ने होंगे जिससे इस कानून की कठोरता में कमी न आए.सत्ता परिवर्तन से आगे सामाजिक परिवर्तन की राजनीति की जरूरतयह बात आजादी के 70 वर्षों के अनुभव पर से साफ हो जानी चाहिए के ऐसे सामाजिक बदलाव के कानून सिर्फ संविधान और कानून के दायरे में बंद रह कर व्यवहार में उतर नहीं सकते. इसे समाज स्वीकृत बनाना पड़ेगा, जिसके लिए गांधी की राजनीति की आवश्यकता है. सत्ता परिवर्तन से आगे जाकर समाज परिवर्तन की राजनीति की आवश्यकता है, जिसे आचार्य विनोबा भावे ने ‘लोकनीति’ का नाम दिया था और जय प्रकाश उसी राजनीति को अपनाकर ‘संपूर्ण क्रांति’ करना चाहते थे. वास्वत में हमें सामाजिक न्याय तो चाहिए लेकिन यह न्यायपूर्ण समाज के बिना प्राप्त हो नहीं सकता, यह समझना आवश्यक है. महात्मा गांधी ऐसी ही न्यायपूर्ण समाज व्यवस्था बनाना चाहते थे. उनका हरिजन आंदोलन भी इसीलिए जातीय या वर्गीय न होकर संपूर्ण समाज के बदलाव के साथ जुड़ा था. गांधी का सामाजिक न्याय का संघर्ष जो अफ्रीका में भारतीय ‘कुली’ के साथ शुरू हुआ था, हमेशा एक नई दुनिया बनाने के सपने से जुड़ता है.

Updated : 11 Oct 2018 2:31 PM GMT
Tags:    
Next Story
Share it
Top