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भगवान! सरकारी बंगला किसी से न खाली करवाए

भगवान! सरकारी बंगला किसी से न खाली करवाए
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कटाक्ष l तारकेश कुमार ओझापद पर थे तो आलीशान बंगला और पद से हटते ही लगे धकियाने. यह तो सरासर अन्याय है. आखिर हमारे राजनेता देश सेवा करें या किराए का मकान ढूंढेÞं, चैनलों को बयान दें या फिर र्इंट-गारा लेकर अपना खुद का मकान बनवाएं?मैं जिस शहर में रहता हूं, इसकी एक बड़ी खासियत यह है कि यहां बंगलों का ही अलग मोहल्ला है. शहर के लोग इसे ‘बंगला साइड’ कहते हैं. इस मोहल्ले या कहें कि कॉलोनी को अंग्रेजों ने बसाया था और इसमें रहते भी तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी ही थे. कहते हैं कि ब्रिटिश युग में किसी भारतीय का इस इलाके में प्रवेश वर्जित था. अंग्रेज चले गए, लेकिन रेल व पुलिस महकमे के तमाम अधिकारी अब भी इन्हीं बंगलों में रहते हैं. बंगलों के इस मोहल्ले में कभी कोई अधिकारी नया-नया आता है; तो कोई कुछ साल गुजार कर अन्यत्र कूच कर जाता है, लेकिन बंगलों को लेकर अधिकारियों से एक जैसी शिकायतें सुनने को मिलती हैं. नया अधिकारी बताता है कि अभी तक बंगले में गृह प्रवेश का सुख उसे नहीं मिल पाया है; क्योंकि पुराना नए पद पर तो चला गया, लेकिन बंदे ने अभी तक बंगला नहीं छोड़ा है. कभी बंगले में उतर भी गए तो अधिकारी उसकी खस्ता हालत का जिक्र करना नहीं भूलते, साथ ही यह भी बड़े गर्व से बताते हैं कि बंगले को रहने लायक बनाने में उन्हें कितनी जहमत उठानी पड़ी. कहलाते हैं इतने बड़े अधिकारी और रहने को मिला है ऐसा बंगला. इस बंगला पुराण के वाचन और श्रवण के बीच ही कब नवागत अधिकारी पुराना होकर अन्यत्र चला जाता है, इसका भान खुद उसे भी नहीं हो पाता. शहर में यह दौर मैं बचपन से देखता आ रहा हूं. अधिकारियों के इस बंगला प्रेम से मुझे बंगले के महत्व का अहसास हुआ. मैं सोच रहा था कि यदि एक अधिकारी का बंगले से इतना मोह है जिसमें प्रवेश करने से पहले ही उस पता है कि यह अस्थायी है और तबादले के साथ ही उसे यह छोड़ना पड़ेगा, तो फिर उन राजनेताओं का क्या जिन्हें देश या प्रदेश की राजधानी में शानदार बंगला उनके पद संभालते ही मिल जाता है. उन्हें तो यही लगता होगा कि राजनीति से मिले पद-रुतबे की तरह उनसे यह बंगला भी कभी कोई नहीं छीन सकता. शायद यही वजह है कि देश के किसी न किसी हिस्से में सरकारी बंगले पर अधिकार को लेकर कोई न कोई विवाद छिड़ा ही रहता है. जैसा कि अभी देश के सबसे बड़े सूबे में पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगलों को लेकर अभूतपूर्व विवाद चल रहा है. पद से हटने के बावजूद माननीय न जाने कितने सालों से बंगले में जमे थे. उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप से हटे भी तो ऐसे तमाम निशान छोड़ गए, जिस पर कई दिनों तक किस्से सुने-सुनाए जाते रहे. उन्होंने तो बंगले का पोस्टमार्टम किया ही, उनके जाने के बाद मीडिया पोस्टमार्टम के पोस्टमार्टम में कई दिनों तक जुटा रहा. नतीजतन देश का कीमती समय बंगला विवाद पर नष्ट होता रहा.सच पूछा जाए तो सरकारी बंगला किसी से वापस ही नहीं कराया जाना चाहिए. जिस तरह माननीयों के लिए यह नियम है कि यदि वे एक दिन के लिए भी माननीय निर्वाचित हो जाते हैं जो उन्हें जीवन भर पेंशन व अन्य सुविधाएं मिलती रहेंगी, ठीक उसी तरह यह नियम भी पारित कर दिया जाना चाहिए कि जो एक बार भी किसी सरकारी बंगले में रहने लगा तो वह जीवन भर उसी का रहेगा. इतना ही नहीं, उसके बैकुंठ गमन के बाद बंगले को उसके वंशजों के नाम स्थानांतरित कर दिया जाएगा. यदि कोई माननीय अविवाहित ही बैंकुंठ को चला गया तो उसके बंगले को उसके नाम पर स्मारक बना दिया जाएगा. फिर देखिए हमारे माननीय कितने अभिप्रेरित होकर देश व समाज की सेवा करते हैं.यह भी कोई बात हुई कि पद पर थे तो आलीशान बंगला और पद से हटते ही लगे धकियाने. यह तो सरासर अन्याय है. आखिर हमारे राजनेता देश सेवा करें या किराए का मकान ढूंढ़ें, चैनलों को बयान दें या फिर र्इंट-गारा लेकर अपना खुद का मकान बनवाएं. यह तो ज्यादती है. देश के सारे माननीयों को जल्द से जल्द यह नियम पारित कर देना चाहिए कि एक दिन के लिए भी किसी पद पर आसीन वाले राजनेता पेंशन की तरह गाड़ी-बंगला भी आजीवन उपभोग करने के अधिकारी होंगे.

Updated : 2 Oct 2018 7:12 AM GMT
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