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वो पहला नेता, जिसकी क्रांतिकारी आवाज से पूरा देश हिल गया

वो पहला नेता, जिसकी क्रांतिकारी आवाज से पूरा देश हिल गया
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लेख ¦ रवि प्रकाश मौर्यहममें से शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा, जो लेनिन के बारे में न जानता हो. रूस के इतिहास में लेनिन का नाम ऐसे नेता के रूप में दर्ज है, जिसने मजदूरों के शोषण के खिलाफ बड़े पैमाने पर आवाज उठाई. रूस से फैली ये चिंगारी जो भड़की तो पूरे विश्व में फैल गई और मजबूरन नीति-नियंताओं को मजदूरों के लिए नए नियम-कानून बनाए पड़े. इसे ही ‘लेनिन क्रांति’ कहा गया. आज हम लेनिन को ‘मजदूरों के महान नेता’ के रूप में याद करते हैं.ये तो हुई रूस के लेनिन की बात, लेकिन क्या हम ‘भारत के लेनिन’ के बारे में जानते हैं? देश का वो नेता, जिसने रूस के लेनिन की ही तर्ज पर भारत के शोषित वर्ग के लिए आवाज उठाई, और उनके लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए. इसीलिए उन्हें ‘भारत का लेनिन’ कहा गया. हां, यहां मैं बाबू जगदेव प्रसाद की ही बात कर रह हूं. बिहार प्रांत के क्रांतिकारी नेता बाबू जगदेव प्रसाद (जन्म : 2 फरवरी 1922, मृत्यु : 5 सितंबर 1974) संभवतः देश के पहले नेता थे, जिसने शोषित वर्ग के अधिकारों के लिए जंग छेड़ते हुए ब्राह्मणवादी निरंकुशता के खिलाफ बिगुल फूंका. वे अपने विचारों में कितने मुखर थे, इसका अंदाजा 25 अगस्त 1967 को दिए गए उनके भाषण के इस अंश से लगाया जा सकता है-“जिस लड़ाई की बुनियाद आज मैं डाल रहा हूं, वह लंबी और कठिन होगी. चूंकि मैं एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूं इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी, परंतु इसकी धारा रुकेगी नहीं. इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जाएंगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जाएंगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे. जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी.”आज जो हम पिछड़ों के लिए आंदोलन देखते हैं, उसकी नींव बाबू जगदेव प्रसाद ने ही डाली थी. उन्होंने अपने भाषणों से शोषित समाज को एक सुर दे दिया था. उनके तर्कपूर्ण विचारों में ऐसी ताकत थी कि उसने ब्राह्मणवादी सत्ता की चूलें हिला दीं. बाबू जगदेव प्रसाद ने वास्तव में राजनीतिक विचारक टी.एच. ग्रीन के उस कथन को चरितार्थ कर दिखाया कि- “चेतना से स्वतंत्रता का उदय होता है, स्वतंत्रता मिलने पर अधिकार की मांग उठती है और राज्य को मजबूर किया जाता है कि वे उचित अधिकारों को प्रदान करे.”टी.एच. ग्रीन की इस उक्ति के संदर्भ में वर्तमान समय को देखें तो आज हम देश के अधिकांश राज्यों की सरकारों के मुखिया ‘शोषित समाज’ के किसी व्यक्ति को ही पाते हैं. इसके पीछे बाबू जगदेव प्रसाद का वो संघर्ष ही है, जिसके जरिए उन्होंने शोषित समाज में नवचेतना का संचार किया. बाबू जगदेव प्रसाद एक महान राजनीतिक दूरदर्शी थे, उन्होंने हमेशा शोषित समाज की भलाई के बारे में सोचा और इसके लिए किसी पार्टी या विचारधारा को महत्व नहीं दिया. मार्च 1970 में बाबू जगदेव प्रसाद के दल के समर्थन से जब दरोगा प्रसाद राय बिहार के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने 2 अप्रैल 1970 को बिहार विधानसभा में ऐतिहासिक भाषण दिया-“मैंने कम्युनिस्ट पार्टी, संसोपा, प्रसोपा जो कम्युनिस्ट तथा समाजवाद की पार्टी है, के नेताओं के भाषण भी सुने है, जो भाषण इन इन दलों के नेताओं ने दिए है, उनसे साफ हो जाता है कि अब ये पार्टियां किसी काम की नहीं रह गई हैं, इनसे कोई ऐतिहासिक परिवर्तन तथा सामाजिक क्रांति की उम्मीद करना बेवकूफी होगी. इन पार्टियों में साहस नहीं है कि सामाजिक-आर्थिक गैर बराबरी जो असली कारण है उनको साफ शब्दों में मजबूती से कहें. कांग्रेस, जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी ये सब द्विजवादी पूंजीवादी व्यवस्था और संस्कृति के पोषक हैं. मेरे ख्याल से यह सरकार और सभी राजनीतिक पार्टियां द्विज नियंत्रित होने के कारण राज्यपाल की तरह दिशाहीन हो चुकी हैं. मुझको कम्युनिज्म और समाजवाद की पार्टियों से भारी निराशा हुई है. इनका नेतृत्व दिनकट्टू नेतृत्व हो गया है. मैं कहता हूं कि सामाजिक न्याय, स्वच्छ तथा निष्पक्ष प्रशासन के लिए सरकारी, अर्धसरकारी और गैरसरकारी नौकरियों में कम से कम 90 सैकड़ा जगह शोषितों के लिए आरक्षित कर दिया जाए.”बाबू जगदेव प्रसाद ने बिहार में राजनीति का प्रजातंत्रीकरण को स्थाई रूप देने के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक क्रांति की आवश्यकता महसूस की. वे मानववादी रामस्वरूप वर्मा द्वारा स्थापित 'अर्जक संघ' (स्थापना 1 जून, 1968) में शामिल हुए. जगदेव बाबू ने कहा था कि अर्जक संघ के सिद्धांतों के द्वारा ही ब्राह्मणवाद को ख़त्म किया जा सकता है और सांस्कृतिक परिवर्तन कर मानववाद स्थापित किया जा सकता है. उन्होंने आचार, विचार, व्यवहार और संस्कार को अर्जक विधि से मनाने पर बल दिया. उस समय ये नारा गली-गली गूंजता था-मानववाद की क्या पहचान- ब्रह्मण भंगी एक सामान,पुनर्जन्म और भाग्यवाद- इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद.7 अगस्त 1972 को शोषित दल तथा रामस्वरूप वर्मा की पार्टी ‘समाज दल’ का एकीकरण हुआ और ‘शोषित समाज दल’ नामक नई पार्टी का गठन किया गया. एक दार्शनिक तथा एक क्रांतिकारी के संगम से पार्टी में नई ऊर्जा का संचार हुआ. बाबू जगदेव प्रसाद ने पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री के रूप में जगह-जगह तूफानी दौरा आरंभ किया. वे नए-नए तथा जनवादी नारे गढ़ने में निपुण थे. सभाओं में बाबू जगदेव प्रसाद के भाषण बहुत ही प्रभावशाली होते थे, जहानाबाद की सभा में उन्होंने कहा था-दस का शासन नब्बे पर,नहीं चलेगा, नहीं चलेगा.सौ में नब्बे शोषित है,नब्बे भाग हमारा है.धन-धरती और राजपाट में,नब्बे भाग हमारा है. बाबू जगदेव प्रसाद को शोषितों के लिए पूरी दमदारी से आवाज उठाते देख अब बिहार की जनता उन्हें 'बिहार लेनिन' के नाम से बुलाने लगी थी. इसी समय बिहार में कांग्रेस की तानाशाही सरकार के खिलाफ जे.पी. के नेतृत्व में विशाल छात्र आंदोलन शुरू हुआ और राजनीति की एक नई दिशा-दशा का सूत्रपात हुआ, लेकिन आंदोलन का नेतृत्व प्रभुवर्ग के अंग्रेजीदा लोगों के हाथ में था, इसलिए बाबू जगदेव प्रसाद ने छात्र आंदोलन के इस स्वरूप को स्वीकृति नहीं दी. इससे दो कदम आगे बढ़कर उन्होंने इसे जन-आंदोलन का रूप देने के लिए मई 1974 को 6 सूत्रीय मांगों को लेकर पूरे बिहार में जन सभाएं की तथा सरकार पर भी दबाव डाला, लेकिन सरकार पर इसका कोई असर नहीं पड़ा, जिससे 5 सितंबर 1974 से राज्य-व्यापी सत्याग्रह शुरू करने की योजना बनी.5 सितंबर 1974 को बाबू जगदेव प्रसाद हजारों की संख्या में शोषित समाज का नेतृत्व करते हुए अपने दल का काला झंडा लेकर आगे बढ़ने लगे. कुर्था में तैनात डी.एस.पी. ने सत्याग्रहियों को रोका तो बाबू जगदेव प्रसाद ने इसका प्रतिवाद किया और विरोधियों के पूर्वनियोजित जाल में फंस गए. सत्याग्रहियों पर पुलिस ने अचानक हमला बोल दिया. बाबू जगदेव प्रसाद चट्टान की तरह जमे रहे और और अपना क्रांतिकारी भाषण जारी रखा. इसी बीच निर्दयी पुलिस ने उनके ऊपर गोली चला दी. गोली सीधे उनके गर्दन में लगी, वे गिर पड़े. सत्याग्रहियों ने उनका बचाव किया, किंतु क्रूर पुलिस उन्हें घसीटते हुए पुलिस थाने ले जाने लगी. वे पानी-पानी चिल्ला रहे थे, लेकिन पुलिस ने उनकी एक न सुनी. जब पास की एक दलित महिला ने उन्हें पानी देना चाहा, तो उसे भी मारकर भगा दिया गया. पुलिस की क्रूरता का आलम ये था कि वे उनकी छाती को बंदूकों की बटों से बराबर पीटते रहे और पानी मांगने पर उनके मुंह पर पेशाब तक कर दिया. आज तक किसी भी राजनेता के साथ आजाद भारत में इतना अमानवीय कृत्य नहीं किया गया. बाबू जगदेव प्रसाद ने थाने में ही अंतिम सांसें ली.इस तरह देखा जाए तो ‘भारत के लेनिन’ की मौत ‘रूस के लेनिन’ से बहुत अलग थी. यहां एक विचारणीय प्रश्न ये है कि ‘रूस के लेनिन’ की आवाज तो पूरी दुनिया में गूंज गई, लेकिन ‘भारत के लेनिन’ की आवाज भारत में ही क्यों दबकर रह गई. स्वयं के अंदर झांक कर देखिये, इस प्रश्न का उत्तर स्वतः ही मिल जाएगा. पहली बात तो यह कि भारत में शोषितों के दिलो-दिमाग में दासता की जड़ें इतनी गहरी धंस गई हैं कि उन्हें उससे निकालना आसान काम नहीं है. दूसरी बात ये कि भारत में ब्राह्मणवादी सत्ता अपने खिलाफ कोई भी आवाज़ उठने पर उस पर विचार नहीं करती, बल्कि दमनकारी नीति अपनाती है. वह सिर्फ उसी स्थित में विचार करती है, जब उसके सामने कोई रास्ता नहीं होता. तीसरी बात यह कि भारत के शोषितों के अंदर वो भावना नहीं है, जो लावे को ज्वाले में बदल सके. अगर इन तीनों में से एक भी बात होती तो शर्तिया भारत के लेनिन की पूरी दुनिया में गूंज रही होती.फिलहाल बाबू जगदेव प्रसाद भारतीय क्रांतिकारी नेताओं के तारामंडल में देदीप्यमान नक्षत्र की भांति सर्वदा चमकते रहेंगे. उन्होंने जिस तरह राजनीतिक आंदोलन को सांस्कृतिक आंदोलन के साथ एका कर आगे बढ़ाया तथा जाति-व्यवस्था पर आधारित निरादर तथा शोषण के विरुद्ध कभी नहीं झुके, उसे हमेशा याद किया जाता रहेगा.

-लेखक 'मेंस मीडिया ग्रुप 'की मासिक पत्रिका 'उदय सर्वोदय' के संपादक हैं.

Updated : 2 Feb 2019 7:41 AM GMT
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