सीमांचल में मुस्लिम मतदाताओं के हाथ में है जीत की चाभी

नई दिल्ली (एजेंसी) :  पूर्वी बिहार में नेपाल, बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे सीमांचल के तीन मुस्लिम बहुल लोकसभा क्षेत्रों में इस बार चुनावी नारा ‘पालेंद्री टोपी-सूर्यपुरी पिरहन एक हो’ चल रहा है. इस नारे से साफ है कि स्थानीय मुस्लिम नेता कटिहार, पूर्णिया और किशनगंज में अपने समुदाय के चार धड़ों को भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए प्रत्याशियों को हराने के लिए लामबंद करने की कोशिशों में जुटे हैं. स्थानीय मुस्लिम नेता चाहते हैं कि इन सीटों पर 18 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण के मतदान में उनका समुदाय एकजुट होकर राजद-कांग्रेस गठबंधन प्रत्याशियों के पक्ष में वोटिंग करे.

क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय का बड़ा वर्ग कुल्हिया मुसलमानों का है. अमूमन लोग उन्हें उनकी कुछ अलग सी दिखने वाली पालेंद्री टोपी से पहचानते हैं. वहीं, किशनगंज सीट पर बड़ा उलटफेर करने का दमखम रखने वाले सूर्यपुरी मुसलमान अपने लंबे कुर्ते पिरहन और खास अंदाज की बोली से पहचाने जाते हैं. क्षेत्र में रहने वाले शेरशाहाब्दी या भाटी पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल से आकर बसे हैं, जबकि पस्चीमा मुस्लिम बिहार के पश्चिमी जिले चंपारण, मुजफ्फरपुर और दरभंगा से आए हैं.

इस बार मुस्लिम सीमांचल की सियासत के केंद्र में हैं. दरअसल, क्षेत्र में अलग-अलग दलों से खड़े हुए नौ मुस्लिम प्रत्याशियों में पांच उम्मीदवार तीन सीटों पर ताल ठोक रहे हैं. लोकसभा चुनाव 2014 में प्रमुख दलों ने बिहार में कुल 16 मुस्लिम प्रत्याशियों पर दांव लगाया था. इस बार क्षेत्र में खड़े हुए पांच प्रत्याशियों में कटिहार से कांग्रेस के तारिक अनवर और अररिया से राजद के सरफराज अहमद को हिंदू प्रत्याशियों से कड़ी चुनौती मिल रही है. वहीं, किशनगंज संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस के मोहम्मद जावेद, जदयू के मोहम्मद अशरफ और एआईएमएआईएम के अखतरुल ईमान के बीच जबरदस्त मुकाबला दिख रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से लेकर किशनगंज के बीच मुस्लिम आबादी को देखते हुए कहा जा सकता है कि सीमांचल में जीत-हार का फैसला मुसलमान मतदाताओं के हाथों में है. भारत-नेपाल सीमा से सटे सीमांचल क्षेत्र में 20 संसदीय क्षेत्र हैं. इन क्षेत्रों में 18 से 70 फीसदी मुस्लिम आबादी है. यह क्षेत्र मुस्लिम राजनीति की प्रयोगशाला बन चुका है. हालांकि, इस क्षेत्र के अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे होने के कारण कई आतंकी माड्यूल भी सामने आ चुके हैं, जिनमें स्थानीय युवाओं की संलिप्तता पाई गई है.

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