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शब्द रस-सुखद रस

शब्द रस-सुखद रस
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बदलाव की संस्कृति ¦ नित्यानंद तिवारीअपने अंतस में ब्रह्माण्ड समाहित किए शब्द देश, काल, परिस्थिति के अनुसार भावार्थ प्रवाहित करते हैं. देखने में निराकार से लगने वाले ये शब्द शरीर, हृदय, बुद्धि एवं आत्मा से परिपूर्ण हैं. शब्द एक रस है जो अन्य रसों से ऊपर एवं पवित्र है. इनका पान नेत्र, कर्ण एवं कभी-कभी त्वचा से किया जाता है. अलग-अलग इंद्रियों के माध्यम से इनके रसपान के विधि का विकास समय एवं आवश्यकता के अनुसार हुआ. पहले शब्द रसपान केवल एक इंद्रिय कान से ही संभव था. कालांतर में लेखनी का विकास हुआ और आंख के माध्यम से भी इसका रसपान शुरू हुआ. दिव्यांगजनों के लिए विकिसत ब्रेल लिपि ने इसका रसपान त्वचा के द्वारा भी संभव कर दिया.शब्द कभी वृद्ध नहीं होता, रु ग्ण नहीं होता, देह भी नहीं त्यागता. यह अपनी आत्मा के साथ अपना शरीर भी प्रवाहमान बनाए रखता है. हां, कभी-कभी गंध नियंत्रित नहीं कर पाता और मनुष्य द्वारा निर्मित वातावरण के सुगंध-दुर्गंध से क्षणिक प्रभावित होता है. शब्द एकत्र किया जाता है, इसके सहारे भावप्रवाह किया जाता है, इसे दूषित करने की कोशिश की जाती है परंतु यह अपनी मूल प्रकृति से भटकता नहीं. भारत साहित्य को संस्कारों के रूप में देखता रहा है और शब्दों को पवित्र मानकर वैदिक, लौकिक एवं आधुनिक कालखंडों के हिसाब से संरक्षित रखा है. शब्दों से सुसज्जित वैदिक साहित्य, उपनिषद, पुराण, भगवद गीता आदि अनगिनत नामों से पवित्रता के रस का प्रवाह करते रहे हैं बिना बासी हुए, बिना क्ष्ािरत हुए.शब्दों की महत्ता अपना अस्तित्व बनाए रखती है. विचार, भाव, संचार के प्रवाह के साथ ही साथ शब्द मानवीय उपलब्धियों को विश्व पटल पर रखने का काम करते हैं. शब्दों के सुनियोजित संचयन एवं उनके प्रकाशन को पुस्तकों का नाम दिया जाता है. शब्द विचार, आविष्कार दर्शन एवं संस्कार को पुस्तकों के माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुंचाते हैं. मानव तक सद्बुुद्धि देने वाले पूर्ववर्ती स्वीकृत एवं प्रमाणित उदाहरणों इत्यादि को पहुंचाने का नेक काम करते हैं. शब्द किसी धर्म जाति या समुदाय की धरोहर मात्र नहीं हैं. इसीलिए विश्व की सभी सभ्यताओं में पुस्तकों के आदर की परंपरा है। कुरान, बाइबिल, अवेस्ता आदि के आदर सर्वविदित हैं।शब्द सामर्थ्य पाठक/श्रोता/प्रयोगकर्ता के सामर्थ्य पर निर्भर करता है. इसलिए लेखक, साहित्यकार शब्द प्रयोग की स्वतंत्रता का लाभ उठाते हैं. अपनी अनुभूति से एक नया संसार बनाते हैं. शब्दों का चयन अपने निर्धारित प्रयोजन के अनुरूप हो, इसे तय करने का उत्तरदायित्व लेखक का है. यदि लेखक ने उचित शब्दों का चयन किया एवं उन्हें यथोचित संयोजित किया तो शब्द प्रवाह सफल, अन्यथा कागज का ढेर. ऐसे निरर्थक एवं नीरस शब्दों में रसाभाव हो जाता है और बिना रस के पाठक/श्रोता को नियंत्रित करने में विफलता मिलती है. पुस्तकों में एक खुशबू होती है जो व्यक्ति विशेष (लेखक) की पहचान बन जाती है. लेखक देह त्याग कर जाता है पर उसके संयोजित शब्द अर्थात पुस्तकें अमर हो जाती हैं. पुस्तकें ब्रह्म रूपी शब्द को धारण करती हैं और अमर हो जाती हैं. शतपथ ब्राह्मण में ऋ षि ने वाणी को विराट बताया है. सच ही है, क्योंकि वाणी शब्द से है और शब्द से ही मानव अपने अस्तित्व की सभी भावनाओं, आवश्यकताओं को संचारित करता है.शब्द मानव के मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाने का काम भी करते हैं. गायत्री मंत्र के उच्चारण को वैज्ञानिकों ने स्वास्थ्य के लिए श्रेष्ठ प्रमाणित किया है. शब्द व्यायाम कराते हैं मन और तन दोनों के. शब्द रस बौद्धिक विलासी भी बनाता है. बौद्धिक विलासिता से बड़ी कोई विलासिता नहीं और इस भोग का आनंद शब्दों के बिना संभव नहीं. लेकिन यह उच्च कोटि का रस है, जिसका पान करने हेतु मनुष्य को आरंभ में ज्यादा श्रम करना पड़ता है. एक बार रसपान करने के बाद इसके स्वाद से वंचित रहना असंभव है. चूंकि यह उच्चकोटि की विलासिता है, परम सुखदाई है, अत: आसानी से उपलब्ध नहीं है. दिखता सर्वत्र है पर प्राप्य दुष्कर है. इस रस तक पहुंचने से पहले कठिन परीक्षा के दौर से गुजरना होता है और श्रेष्ठ ही यहां पहुच पाते हैं. बाकी तो विद्या विहीन: पशुभि समान:. जिसने इस परमसुख को देखा नहीं उसे कल्पना भी नहीं इसकी उच्चता की. निरर्थक वस्तुएं खरीदने को सुख या विलासिता समझने वाले वास्तव में जान ही नहीं पाते कि वास्तविक सुख उपेक्षित सी पड़ी पुस्तकों में शब्दों के रूप में संगृहीत है. आजीवन दुरूह कार्य करके भी सुखानुभूति से वंचित रहने वाले या जीवन के नए अध्याय खोलने वाले एकबार शब्द रस का पान करके देखें, शायद जीने का तरीका ही बदल जाए.(लेखक वीएल मीडिया सोलुशंस के प्रबंध निदेशक हैं)

Updated : 11 Oct 2018 2:54 PM GMT
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