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श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज में हुआ दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज में हुआ दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
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दिल्ली, ब्यूरो | राष्ट्रवाद और भारतीय राजनीति’ के विषय पर आज श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज के राजनीति विभाग की तरफ से दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया जो कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रायोजित हैं। जिसमें मंच का संचालन सहायक प्रोफेसर डॉ. आमना मिर्जा ने किया तथापि इस कार्यक्रम के संयोजक सहायक प्रोफेसर संजीव कुमार व एसोसिएट प्रोफेसर शुभा सिन्हा। इसके उद्घाटन सत्र की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन से हुई जिसमें कॉलेज की प्राचार्य डॉ. साधना शर्मा, सम्मानीय अतिथि प्रो. अभय दुबे, प्रो. संजीव, शुभा सिन्हा, राजकुमार उपस्थित रहे। इसके बाद सरस्वती वंदना हुई जिसमें कॉलेज की छात्राओं ने भाग लिया। इसके बाद संगीत विभाग की छात्राओं ने सितार वादन पर वंदे मातरम् राष्ट्रीय गीत के माध्यम से श्रोतागण को मंत्र मुग्ध किया।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि प्रो. संजय पासवान रहे। कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. साधना शर्मा ने अपने सम्बोधन में राष्ट्रीय सेमिनार के विषय में बोलते हुए कहा “हम दरियाँ हैं जिस तरफ भी चल पड़ेंगें, रास्ते बन जाएगे।” राष्ट्रवाद को परिभाषित करते हुए कहा जिस देश की भाषा व संस्कृति एक जैसी होती है वह राष्ट्रवाद है। इस संगोष्ठी के सम्मानीय अतिथि ने शीर्षक पर बोलते हुए कहा राष्ट्रवाद एक विचारधारा है जबकि देशभक्ति एक जज्बा है आगे बोलते हुए कहा संविधान में हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं है बल्कि राजभाषा है। संविधान में सभी भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा घोषित किया गया है इस तरह से भारत का राष्ट्रवाद बहुभाषायी राष्ट्रवाद है जबकि अमेरिका व ब्रिटेन में एक अंग्रेजी भाषा को राष्ट्रवाद माना है। इसी विषय पर आगे बोलते हुए कहा इस तरह से राष्ट्रवाद की शुरुआत 16वीं शताब्दी में हुई जिसमें अंग्रेजी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने का कार्य शुरु हुआ इसलिए ब्रिटेन के अन्य प्रांतों में दूसरी भाषाओं जैसे आयरिश, स्कार्टिश की जगह अंग्रेजी भाषा का सार्वजनिक क्षेत्र में प्रयोग किया गया।

इस विषय पर आगे बोलते हुए कहा कि किस तरह से भारतीय राष्ट्रवाद बहुभाषायी राष्ट्रवाद है इसका समीकरण ठीक तभी रहेगा जब तुम बहुभाषायी रणनीतिकार बनकर हर समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। मुख्य अतिथि प्रो. संजय पासवान ने राष्ट्रवाद को परिभाषित करते हुए राज, राष्ट्र एवं देश इन तीनों के विषयों में विस्तार से चर्चा की किस तरह से व्यवधान आते हैं, तो वहाँ प्रावधानों, विधानों एवं संविधान के रास्ते के माध्यम से समाधान निकाला जाता है। क्योंकि जहाँ राजनीति होती है वहाँ साजिश होती है। बलिदान पर बोलते हुए कहा जो त्यागता है वो भोगता ही है। अगर राष्ट्रवाद हो तो लोकतंत्र के भाव को बढ़ाने के लिए हो।

Updated : 9 Sep 2019 7:58 AM GMT
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