Top
Home > नजरिया > पश्चिम बंगाल विवाद में जीत किसकी हुई, ममता या भाजपा की?

पश्चिम बंगाल विवाद में जीत किसकी हुई, ममता या भाजपा की?

पश्चिम बंगाल विवाद में जीत किसकी हुई, ममता या भाजपा की?
X

लेख ¦ अवधेश कुमार उच्चतम न्यायालय का आदेश प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का धरना खत्म करने का आधार बना. हालांकि उन्होंने न्यायालय के आदेश को अपनी नैतिक जीत, पश्चिम बंगाल की जीत बता दिया. आखिर इस आदेश में ऐसा क्या है जिसे उनकी जीत मानी जाए?न्यायालय ने अभी सीबीआई कर्मियों के साथ पश्चिम बंगाल पुलिस के दुर्व्यवाहर पर विचार नहीं किया है. न्यायालय के सामने ममता का विरोध और धरना भी विचार का विषय नहीं था. उसके सामने पहला विषय सीबीआई को कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से पूछताछ की अनुमति देने का था. यह न्यायलय ने दे दिया. उसने पश्चिम बंगाल की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी से ही पूछ दिया कि आखिर उनको सीबीआई के सामने पेश होने में समस्या क्या है?मुख्य न्यायाधीश ने यह भी पूछा कि पश्चिम बंगाल को जांच के हमारे आदेश से क्या दिक्कत है? सीबीआई ने राजीव कुमार की गिरफ्तारी की अनुमति की अपील की ही नहीं थी, इसलिए यह कहना कोई मायने नहीं रखता कि गिरफ्तारी की अनुमति नहीं मिलना सीबीआई के लिए धक्का है. सीबीआई ने यह कहा ही नहीं था कि वह राजीव कुमार के आवास पर उनको गिरफ्तार करने गई थी. उच्चतम न्यायालय के आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राजीव कुमार को अब सीबीआई के सवालों का जवाब देने शिलांग जाना होगा यानी पश्चिम बंगाल में उनसे पूछताछ नहीं होगी. इसका अर्थ क्या है? क्या यह ममता सरकार के व्यवहार पर बिना बोले न्यायालय की टिप्पणी नहीं है?इन सबका अर्थ निकालने के लिए हम स्वतंत्र हैं, किंतु जिस तरह सीबीआई की टीम को कोलकाता पुलिस ने अपराधी की तरह पकड़ा, उनको गाड़ी में बिठाकर थाने ले गए, सीबीआई के संयुक्त निदेशक के घर को घेर लिया गया, क्षेत्रीय कार्यालय को पुलिस घेराव के कारण सुरक्षा के लिए सीआरपीएफ को उतारना पड़ा वो सारे वाकये उच्चतम न्यायालय के सामने थे. आगे ऐसा न हो, इसलिए राजीव कुमार एवं ममता बनर्जी के प्रभाव से बाहर के क्षेत्र में उनसे पूछताछ होगी. वहां राजीव कुमार एक सामान्य नागरिक होंगे. उनकी सुरक्षा में कोलकाता पुलिस नहीं होगी. चूंकि सारदा चिटफंड एवं रोजवैली घोटाला का यह मामला सीबीआई को उच्चतम न्यायालय के आदेश से मिला है, इसलिए उसके काम में बाधा डालना वास्तव में न्यायालय की भी अवमानना होगी. सीबीआई ने राजीव कुमार के साथ पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक वीरेंद्र कुमार तथा मुख्य सचिव मलय कुमार डे पर न्यायालय की अवमानना का मामला चलाने की भी अपील की है. इन अधिकारियों ने सीबीआई के अनुरोध की लगातार उपेक्षा की. साथ ही पुलिस बल भी इनके मातहत आता है जिसने न्यायालय के आदेश के तहत जांच करने वालों के साथ अपराधी जैसा व्यवहार किया तथा सीबीआई के लिए काफी देर तक आतंक का माहौल कायम कर दिया. उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में नोटिस जारी कर दिया है, जिसका जवाब इन्हें 18 फरवरी तक देना है, साथ ही 20 फरवरी को अगली सुनवाई में प्रमुख सचिव, महासचिव और कुमार तीनों को व्यक्तिगत रूप से भी पेश होना होगा.यह किसी तरह अनुकूल आदेश तो नहीं है. अगर न्यायालय ने इन्हें जवाब के साथ उपस्थित होने का आदेश दिया है तो इनकी मेहमानवाजी के लिए नहीं. इनके जवाब से संतुष्ट न होने पर वह कार्रवाई भी कर सकता है. इस आदेश को अगर ममता बनर्जी अपनी जीत, लोकतंत्र की विजय तथा नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की पराजय कह रही हैं तो इस पर कोई टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है. उच्चतम न्यायालय का रुख सुनवाई के दौरान हुई टिप्पणियों से भी स्पष्ट हो जाता है. हम यह नहीं कहते कि राजीव कुमार दोषी है. वे सक्षम पुलिस अधिकारी माने जाते रहे हैं. उनके नाम कई उपलब्धियां हैं, साहस के कई कारनामें हैं, किंतु इस मामले में उनका रवैया अस्वीकार्य रुप से असहयोगात्मक रहा है, यह साफ है. सीबीआई ने यदि उच्चतम न्यायालय में उन पर आरोप लगाए हैं तो उस पर सहसा अविश्वास नहीं किया जा सकता. उच्चतम न्यायालय में एजेंसी झूठा शपथपत्र देगी तो उसे लेने के देने पड़ जाएंगे. सीबीआई ने 14 पृष्ठों का जो शपथपत्र दिया है उसमें कौल रिकार्ड से लेकर आरोपियों से बरामद सबूत नष्ट करने तथा दोषियों को बचाने का आरोप है. उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई को केवल गिरफ्तारी का आदेश नहीं दिया, लेकिन पूछताछ के बाद अगर वो छापा मारना चाहती है तो ऐसा करने में कोई रोक नहीं है.ममता बनर्जी आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू के बाद दूसरी मुख्यमंत्री थी, जिन्होंने 16 नवंबर 2018 को राज्य में सीबीआई के प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया था. दिल्ली पुलिस इस्टेब्लिशमेंट कानून के अनुसार सीबीआई को राज्यों के मामलों की जांच के लिए सहमति जरुरी है, किंतु सहमति वापस लेने का अर्थ यह नहीं है कि उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय किसी मामले की जांच का आदेश दे तो भी सीबीआई ऐसा नहीं करती. संभव है ममता के फैसले के बाद कुछ अधिकारियों को गलतफहमी हुई हो कि अब सीबीआई उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकती. शायद ममता के कुछ सहयोगियों को भी गलतफहमी रही हो. तो उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद यह गलतफहमी दूर हो गई होगी. ममता चाहे इस पूरे प्रकरण का जैसे मूल्यांकन करें, राजीव कुमार के घर पर पहुंचकर तथा धरना देकर उन्होंने सीबीआई का ही पक्ष मजबूत किया है. अगर सीबीआई को नहीं रोका जाता तो वह उच्चतम न्यायालय शायद ही जाती। अब वे ज्यादा आत्मविश्वास और आक्रामकता से कार्रवाई करेंगे.इस प्रकरण के कई पहलू और हैं जिस पर विचार करना आवश्यक है. चन्द्रबाबू नायडू की उपस्थिति में मेट्रो सिनेमा से धरना खत्म करते हुए ममता बनर्जी ने कुछ और बातें कहीं. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार राज्य की एजेंसियों समेत सभी जांच एजेंसियों पर नियंत्रण रखना चाहती है. मोदी को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर गुजरात लौट जाना चाहिए. मोदी अपनी दादागिरी चला रहे हैं. कोई भी उनके खिलाफ बोलता है तो उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है. मोदी जी ने संविधान को नष्ट कर दिया, गणतंत्र को नष्ट कर दिया. मेरा कहना है मोदी हटाओ और देश बचाओ. कहने की आवश्यकता नहीं कि यह पूरा भाषण राजनीतिक है. इसमें कोई तथ्य नहीं है. यह भाषण वो लगातार दे रहीं हैं. प्रश्न है कि इसका सीबीआई की जांच बाधित करने से क्या संबंध है? इसका अर्थ साफ है. ममता पिछले लंबे समय से इस रणनीति पर काम कर रही हैं कि उनको नरेन्द्र मोदी से सीधे टकराने वाली नेता और मुख्यमंत्री के रुप में जाना जाए. उसके लिए हर अवसर को गलत दिशा देकर वो टकराव की भंगिमा अख्तियार करतीं हैं. 19 जनवरी को विपक्षी नेताओं को परेड ग्राउंड में एक मंच पर इकट्ठा कर उन्होंने यह बताने की कोशिश की विपक्ष में मैं अकेले इतनी प्रभावी हूं कि सभी मेरे बुलावे पर आ सकते हैं.वास्तव में इस मामले में ऐसा कुछ नहीं था कि धरना देने की आवश्यकता हो. राजीव कुमार से पूछताछ उनकी पुलिस ने नहीं होने दिया. उनकी पुलिस ने सीबीआई अधिकारियों को हिरासत में लिया. ममता बनर्जी ने स्वयं कहा कि हम चाहते तो उनको गिरफ्तार कर सकते थे लेकिन हमने उनको छोड़ दिया, तो इसमें उत्पीड़ित कौन हुआ? सीबीआई या ममता बनर्जी या उनके चहेते अधिकारी? मामला उच्चतम न्यायालय के आदेश पर सीबीआई की वैध कार्रवाई का था. उच्चतम न्यायालय में पश्चिम बंगाल के वकील ने भी केवल सीबीआई का ही नाम लिया. आगामी लोकसभा चुनाव में उनके सामने भाजपा सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है जिससे अंदाजा उनको है. इससे निपटने के लिए वो लगातार एक मुख्यमंत्री की अपनी भूमिका भूलकर अलोकतांत्रिक हरकत पर उतर जाती हैं. यह सब वो जान-बूझ कर करती हैं. वो यह मानती हैं आम बंगाली का आत्माभिमान इससे उनके पक्ष में जागेगा कि केन्द्र सरकार और भाजपा उनको अपमानित ऐसे परेशान कर रही है, लेकिन विवेकशील लोगों को सच पता होगा.ममता को लगता होगा कि इससे चुनाव में पुलिस और प्रशासन का उनको पूरा समर्थन मिल जाएगा तथा वे सब भाजपा विरोधी हो जाएंगे. 2016 के विधानसभा चुनाव में यह खेल उन्होंने खेला था, किंतु चुनाव आयोग सब देख रहा है. जरूरत पड़ने पर वह बाहरी पुलिस और सुरक्षा बल बुलाकर चुनाव करा सकता है. इन सबसे परे यह प्रश्न तो उठेगा ही कि जो लाखों गरीब और निम्न मध्यम वर्ग दोनों मामलों में लुट गए, बरबाद हो गए उनको न्याय दिलाने में मुख्यमंत्री के नाते ममता बनर्जी की कोई जिम्मेवारी है या नहीं? आखिर उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई को यही जिम्मेवारी तो सौंपी है, जिसकी वो मुखालफत कर रही थी.(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

Updated : 9 Feb 2019 5:36 AM GMT
Tags:    
Next Story
Share it
Top