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कोरोना संकट के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन पर उठते सवाल

कोरोना संकट के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन पर उठते सवाल
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अवधेश कुमार

विश्व स्वास्थ्य संगठन याडब्लूएचओ के विरुद्ध इस समय दुनिया भर में जिस तरह की नाराजगी और नाखुशी व्याप्तहै वैसा उसके सात दशक से ज्यादा के इतिहास में नहीं देखा गया। इस नाराजगी औरनाखुशी में मुख्य निशाने पर हैं इसके निदेशक जनरल टेड्रोस एडनोम गेब्रेइसिस। उनकेइस्तीफे तक की मांग हो रही है। अमेरिका में तो उनके खिलाफ आक्रामक अभियान चल रहाहै। फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देश भी आक्रामक हैं। अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन कीफंडिंग रोक दी है। हालांकि इसकी घोषणा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही कर दीथी।

डोनाल्ड ट्रंप ने 7 अप्रैल को कहा थाकि हम डब्ल्यूएचओ को कुछ वजहों से बहुत अधिक फंड देते हैं लेकिन यह बहुत चीनकेंद्रित रहा है और हम अब फंड को सही रूप देंगे। इसने हमें कोरोना से निपटने मेंगलत सलाह दी थी और हमने उसे नहीं माना।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंपने कोरोना संकट में विश्व स्वास्थ्य संगठन की भूमिका की आलोचना करते हुएगेब्रेइसिस के पद से हटने की मांग की। अमेरिका के कई सांसदों ने निदेशक के खिलाफअभियान चलाया हुआ है। इन लोगों का साफ कहना है कि निदेशक टेड्रोस गेब्रेइसिस ने नकेवल दुनिया को कोरोना महामारी को लेकर झूठ बोला, बल्कि उस चीन का बचाव किया जिसके कारण आज लाखोंइसके शिकार हैं तथा हजारों मर रहे हैं। ट्रंप ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठनलगातार चीन का पक्ष लेता रहा और उसे बचाता रहा। अगर दुनिया को पहले इसकी जानकारीहोती तो इतनी जानें नहीं जातीं।

चूंकि इस समय दुनिया केप्रमुख देश अपने यहां कोरोना के भयंकर प्रकोपों से निपटने में व्यस्त हैं, इसलिए एक साथहमें विश्व स्वास्थ्य संगठन और टेड्रोस गेब्रेइसिस के खिलाफ आवाजें भले सुनाई नपड़े, लेकिन पश्चिमीयूरोप से लेकर पूर्वी एशिया तक मोटा-मोटी वातावरण ऐसा ही है। हर देश की मीडिया मेंआपको विश्व स्वास्थ्य संगठन और गेब्रेइसिस के खिलाफ लगातार टिप्पणियां मिल जाएंगी।जापान के उप प्रधानमंत्री तारो असो ने तो प्रतिनिधि सभा को संबोधित करते हुए कहाकि विश्व स्वास्थ्य संगठन का नाम बदलकर चीनी स्वास्थ्य संगठन होना चाहिए। इनमेंविस्तार से जाए बगैर यहां कुछ प्रश्नों को सामने रखकर पूरी सही निष्कर्ष परपहुंचने की कोशिश की जा सकती है।

क्या विश्व स्वास्थ्यसंगठन ने स्थिति की गंभीरता दिखते हुए भी पर्याप्त कदम नहीं उठाया? क्या वाकई उसनेचीन में फैलती महामारी के बीच सही जानकारी प्राप्त करने का प्रयास नहीं किया? या वह चीन को जान-बूझकरबचाता रहा? क्या जैसा आरोप लग रहा है उसने समय पर चेतावनी न देकर विश्व को खतरे में डालदिया?

विश्व स्वास्थ्य संगठन नेसारे आरोपों को खारिज किया है। 8 अप्रैल को वीडियो कॉन्फ्रेंस से आयोजित पत्रकार वार्ता में गेब्रेइसिसने कहा कि अमेरिका और चीन को एक साथ आना चाहिए और इस खतरनाक दुश्मन से लड़ना चाहिए।इस बयान ने कई देशों की नाराजगी और बढ़ा दी है। 10 अप्रैल के सुरक्षा परिषद की विशेष बैठक में भीचीन के साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन की आलोचना हुई।

यह सच है कि अगर विश्वस्वास्थ्य संगठन सही समय पर चेातवनी और दिशा-निर्देश जारी करता तो भयावह मानवीयत्रासदी को काफी कम किया जा सकता था। कोरोना का संक्रमण मनुष्य से मनुष्य मेंफैलता है लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन ने लंबे समय तक इसे स्वीकार नहीं किया।नवंबर, दिसंबर में ही कोरोनावायरस का मामला चीन में आ गया था। चीन ने तो जानकारियां छिपाकर या भ्रामकजानकारियां देकर दुनिया को गुमराह किया ही, विश्व स्वास्थ्य संगठन इसमें सहभागी बन गया।फरवरी में चीन में घोषित रूप से 17,238 कोरोना संक्रमणके मामले आ चुके थे, लेकिन गेब्रेइसिस ने यहां से दुनिया भर की यात्राओं पर रोकलगाने से इंकार कर दिया था।

गेब्रेइसिस ने 23 जनवरी को जेनेवामें कोरोना को लेकर एक आपात बैठक में कहा था कि हमने यात्रा और व्यापार पर व्यापकप्रतिबंध की सिफारिश नहीं की, लेकिन एयरपोर्ट्स पर यात्रियों की स्क्रीनिंग होना चाहिए।इसके बाद कोरोना वायरस अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, थाईलैंड और सऊदी अरब में फैला था।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के दस्तावेज के अनुसार, 7 जनवरी को चीन ने कोरोना वायरस के प्रसार कीसूचना दी थी। इसके पहले उसने 31 दिसंबर, 2019 को कहा था कि 41 लोग नियोमिनारोग से पीड़ित हैं जिसके संक्रमण एवं मौतों का कारण का पता नहीं चल पा रहा है। जब यह 20 जनवरी को पहली रिपोर्ट सामने लाया तब तककोरोना पूर्वी एशिया के कई देशों यथा थाईलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया आदि तक पहुंचा चुका था। 23 जनवरी को ही चीनने वहुान शहर वाले पूरे हूबेई प्रांत को लॉकडाउन कर दिया। इसके बावजूद यदि संगठनने स्थिति की विस्तृत रिपोर्ट एवं मार्ग निर्देश जारी नहीं किया तो इसे क्या कहाजाएगा?

गेब्रेइसिस 27 जनवरी को चीन गए, राष्ट्रपति शीजिनपिंग से भेंट की, स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण लोगों से भी बातचीत की लेकिनदुनिया को इससे सुरक्षा के उपाय करने की जगह उन्होंने चीन और शी जिनपिंग को प्रमाणपत्र दिया कि वे यदि सख्त कदम नहीं उठाते तो यह ज्यादा विकराल होकर दुनिया में फैलजाता। कोरोना संक्रमण को काबू में रखने के लिए दुनिया को चीन का आभारी होना चाहिए।

उस समय तक कोरोना केमामले 15 देशों में आचुके थे। गेब्रेइसिस की भूमिका विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संगठन केप्रमुख जैसा लगा ही नहीं। एक स्वतंत्र टीम का गठन होना चाहिए था, लेकिन उन्होंनेविश्व स्वास्थ्य संगठन एवं चीन की संयुक्त टीम बना दी। चीनी विशेषज्ञ अपने देश केखिलाफ जा नहीं सकते थे। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इनकी रिपोर्ट में कोरोनाप्रकोप की स्थिति एवं रोकथाम संबंधी सुझावों पर ध्यान केन्द्रित किया ही नहीं गया।इसमें यह अनुशंसा की गई किअंतरराष्ट्रीय समुदाय चीन के साथ अपना संपर्क बनाए ताकि आर्थिक गतिविधियां फिर से शुरू हों।

30 जनवरी को संगठनने कोरोना कोविड-19 प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय चिंता वाली स्वास्थ्य आपदा घोषितकिया, लेकिन इसमें नहींबताया कि यह वैश्विक महामारी का रुप ले रहा है या ले सकता है। 4 से 8 फरवरी के बीचसंगठन के कार्यकारी बोर्ड की बैठक के एजेंडा में कोरोना कोविड-19 शामिल ही नहींथा। इसने 11 मार्च को इसे वैश्विक महामारी तब घोषित किया जब यह नियंत्रण से बाहर जा चुकाथा। उसके पहले तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना से निपटने के लिए सार्कदेशों की बैठक बुला ली थी तथा जी-20 के लिए प्रयासरत थे।

इस तरह यह स्वीकरने मेंकोई समस्या नहीं है कि कोरोना कोविड-19 संकट के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन एक ज़िम्मेवार, स्वतंत्र, निष्पक्ष और कुशलसंगठन के रूप में काम करने में बुरीतरह विफल रहा और उसे आज की भयावह स्थिति के दोष से मुक्त नहीं किया जा सकता।

वैसे तो इस संगठन परताकतवर देशों के साथ बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के प्रभाव का आरोप लगता रहा है औरउसमें सच्चाई भी है। इसमें सुधार की मांग पहले से उठती रही है। कोरोना संकट ने साफकर दिया है कि ऐसे लचर संगठन से अब उभरने वाली स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करनेमें दुनिया सक्षम नहीं हो सकती।

Updated : 12 May 2020 8:27 AM GMT
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