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    मराठा के बाद मुसलमानों को साधने की कोशिश में एकनाथ शिंदे
    राजनीति

    मराठा के बाद मुसलमानों को साधने की कोशिश में एकनाथ शिंदे

    Chetan PalBy Chetan PalJanuary 6, 2024Updated:January 6, 2024No Comments9 Mins Read
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    संजय रोकड़े

    जब देश में हिंदू-मुस्लिम व जाति आधारित राजनीति का बोलबाला हो तो ऐसे में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे इस तरह की राजनीति करने में पीछे क्यूं रहे। हम यहां इस बात का दावा इसलिए भी कर सकते है क्यूंकि अभी-अभी उनने राज्य में इस तरह की राजनीति करने के कुछ प्रमाण छोड़े है।

    काबिलेगौर हो कि हाल ही में एकनाथ शिंदे ने हिंदूओं की भावनाओं के साथ खेल खेलते हुए कहा है कि मैं ठाणे जिले में स्थित हाजी मलंग दरगाह की मुक्ति के लिए प्रतिबद्ध हूं। जबकि इसके पहले उनने मराठा आंदोलन को साधने की पुरजोर कोशिश करते हुए मराठा- ओबीसी के खेल का बखूबी खेला था। मराठाओं को ओबीसी में शामिल करने की बात को स्वीकार कर राजनीतिक चाल चलते हुए एकनाथ ने मराठा आंदोलन को साधने में कोई कोर कसर नही छोड़ी। इस आंदोलन को साधते हुए उनने साफ संदेश दिया कि वे किसी भी कीमत पर मराठा वोट बैंक को अपने पाले में करना चाहते हैं।

    तो चले हम चलते है इन दो अलग- अलग मुद्दों के विस्तार की तरफ। सबसे पहले बात करते है मुंबई के ठाणे जिले में स्थित हाजी मलंग दरगाह की। अभी-अभी एकनाथ शिंदे ने हाजी मलंग दरगाह को लेकर ऐसा विवादस्पद बयान दे दिया है जिसके चलते राज्य में हिंदू-मुस्लिम को लेकर एक नया बखेड़ा खड़ा हो गया है। एकनाथ ने मलंग दरगाह को लेकर जो बयान दिया है वो ये है कि- मैं सदियों पुरानी हाजी मलंग दरगाह- जिसके मंदिर होने का दक्षिणपंथी समूह दावा करते हैं- इसकी ‘मुक्ति’ के लिए प्रतिबद्ध हूं।

    हालाकि उनके इस बयान को दरगाह के एक ट्रस्टी ने राजनीतिक लाभ उठाने वाला बयान करार देकर नकार दिया है। इसके पहले की सीएम के इस बयान के बाद राज्य में किस तरह की स्थिति का निर्माण हुआ, उनके इस बयान को लेकर किसने क्या कहा इस पर बात पर चर्चा करने के पूर्व आपको दरगाह की हिस्ट्री की तरफ ले चलता हूं।

    हाजी मलंग दरगाह, ठाणे जिले में माथेरान पहाड़ी श्रृंखला पर समुद्र तल से 3 हजार फीट ऊपर एक पहाड़ी किले मलंगगढ़ के सबसे निचले पठार पर स्थित है। इस दरगाह में यमन के 12 वीं शताब्दी के सूफी संत हाजी अब्द-उल-रहमान (जिन्हें हाजी मलंग बाबा के रूप में भी जाना जाता है) की मजार है। इस दरगाह को तीन सदस्यीय ट्रस्ट संचालित करता है। इसके ट्रस्टियों में से एक ट्रस्टी चंद्रहास केतकर, जिनका परिवार पिछली 14 पीढिय़ों से दरगाह का प्रबंधन कर रहा है, ने साफ कहा है कि, ‘जो कोई भी दरगाह के मंदिर होने का दावा कर रहा है, वह ऐसा राजनीतिक लाभ उठाने के लिए कर रहा है।’

    इसके साथ ही केतकर ने कहा कि ‘1954 में सुप्रीम कोर्ट ने केतकर परिवार के भीतर दरगाह के नियंत्रण से संबंधित एक मामले में टिप्पणी की थी कि दरगाह एक मिश्रित संरचना है, जिसे हिंदू या मुस्लिम कानून से शासित नहीं किया जा सकता है, बल्कि केवल इसके अपने विशेष रीति-रिवाजों या ट्रस्ट के सामान्य कानून द्वारा शासित कर सकते हैं।’

    याने दरगाह के ट्रस्टी चंद्रहास की इस बात से साफ हो जाता है कि, ‘राजनेता अब इस विवाद को सिर्फ अपने वोट बैंक को आकर्षित करने और एक राजनीतिक मुद्दा खड़ा करने के लिए उछाल रहे हैं।’ दरगाह के ट्रस्टी परिवार से ही संबंध रखने वाले अभिजीत केतकर का कहना था कि इस दरगाह पर हर साल हजारों लोग अपनी मन्नत पूरी करने के लिए आते है।

    आपको बता दे कि, दरगाह के इतिहास को लेकर समय-समय पर अनेक मीडिय़ा संस्थान भी सच को उजागर करते रहे है। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस दरगाह का उल्लेख विभिन्न ऐतिहासिक अभिलेखों में मिलता है, जिसमें 1882 में प्रकाशित बॉम्बे प्रेसीडेंसी का गजट भी शामिल है। इसमें कहा गया है कि दरगाह अरब मिशनरी हाजी अब्द-उल-रहमान, जो हाजी मलंग के नाम से लोकप्रिय थे, के सम्मान में बनाई गई थी। कहा जाता है कि स्थानीय शासक नल राजा के शासनकाल के दौरान सूफी संत यमन से कई अनुयायियों के साथ आए थे और पहाड़ी के निचले पठार पर बस गए थे।

    दरगाह का बाकी इतिहास पौराणिक कथाओं से ओत-प्रोत है और स्थानीय स्तर पर दावा किया जाता है कि नल राजा ने अपनी बेटी की शादी सूफी संत से की थी। दरगाह परिसर के अंदर हाजी मलंग और मां फातिमा दोनों की कब्रें स्थित है। बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गजट में कहा गया है कि इमारत और कब्रें 12 वीं शताब्दी से अस्तित्व में हैं और पवित्र मानी जाती हैं।

    पर राज्य के मुख्यमंत्री का ताजा बयान आने से नये सिरे से बखेड़ा खड़ा हो गया है। ये बात दीगर है कि बीते कुछ दशकों से हिंदू पक्ष इस दरगाह को मंदिर बताता आ रहा है। शिंदे के राजनीतिक गुरु आनंद दीघे 1980 में इसको लेकर आंदोलन करने वाले पहले व्यक्ति थे। दीघे का दावा था कि इस इमारत की जगह पर योगियों के एक संप्रदाय नाथ पंथ से संबंधित एक पुराना हिंदू मंदिर ‘मछिंद्रनाथ मंदिर’ हुआ करता था। साल 1996 में वह यहां पूजा करने के लिए 20 हजार शिवसैनिकों को मंदिर में ले जाने पर अड़ गए थे। उस वर्ष तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी के साथ-साथ शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे भी पूजा में शामिल हुए थे। तब से सेना और दक्षिणपंथी समूह इस इमारत को श्री मलंगगढ़ के नाम से पुकारते हैं।

    बहरहाल, यह इमारत अभी भी एक दरगाह है, लेकिन पूर्णिमा के दिन हिंदू इसके परिसर में आते हैं और आरती करते हैं। वहीं, 1990 के दशक में सत्ता में आने पर इस मुद्दे को शिवसेना ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था, लेकिन अब शिंदे ने इस मुद्दे को फिर से हवा देने का काम शुरू कर दिया है। संयोग से शिंदे ने फरवरी 2023 में दरगाह का दौरा किया था। तब उनने आरती की थी और दरगाह के अंदर भगवा चादर भी चढ़ाई थी। अब 11 महीने बाद फिर से उनने इस मुद्दे पर आक्रामकता बढ़ा दी है।

    बहरहाल ये तो था हाजी मलंग दरगाह के बहाने हिंदू-मुस्लिम राजनीति का एक नमूना। अब हम चलते है मराठा आंदोलन पर एकनाथ शिंदे की रणनीति की तरफ। इसमें दो राय नही है कि मराठा आंदोलन को अपने पक्ष में करने में एकनाथ शिंदे ने सफलता पाई है। बेशक, एकनाथ ने मराठाओं को किसी भी तरह लामबंद करके अपने पक्ष में किया और ऐसा करके उनने उद्धव ठाकरे को नुकसान पहुंचाया है। इसके चलते एक ओर जहां मुख्यमंत्री की सियासी जमीन मजबूत हुई है, वहीं ठाकरे का जनाधार भी कमजोर हुआ है।

    काबिलेगौर हो कि जब दीवाली के करीब आने के साथ-साथ सामाजिक तनाव गहराने की आशंकाएं बढऩे लगी थी ऐसे में तब सीएम ने अपने सहयोगी और पूर्व पत्रकार मंगेश चिवाटे—जो सीएम के चिकित्सा सहायता प्रकोष्ठ के प्रमुख हैं—को जारांगे-पाटिल के साथ बात करने का जिम्मा सौंप दिया। चिवाटे काफी हद तक जरांगे-पाटील का रुख नरम करने में कामयाब रहे थे। इसी बीच, शिंदे कैबिनेट ने जस्टिस संदीप शिंदे (सेवानिवृत्त) की अगुआई वाली एक समिति की रिपोर्ट स्वीकार कर ली, जिसमें मराठवाड़ा क्षेत्र के मराठाओं को पिछड़े वर्ग में शामिल करने की सिफारिश की गई थी। हालांकि, इसके लिए उनके पास खुद को कुनबी साबित करने वाला वंशावली रिकॉर्ड होना जरूरी है। इसके बाद, 2 नवंबर को प्रदर्शनकारियों को अपना अनशन वापस लेने के लिए मनाने के उद्देश्य से मंत्रियों का एक प्रतिनिधिमंडल दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों एम.जी. गायकवाड़ और सुनील शुक्रे के साथ विमान से अंतारवाली-सारती पहुंचा दिया। महाराष्ट्र की राजनीति में संभवत: ऐसा पहली बार हुआ था कि सरकार ने आंदोलनकारियों को विरोध वापस लेने पर राजी करने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों का सहारा लिया।

    इसमें कोई दो राय नही है कि जब से एकनाथ मराठा आरक्षण को लेकर विरोध प्रदर्शन करने वाले नेताओं को अपने पक्ष में करने में सफल हुए है तब से मराठाओं के बीच उनकी एक अलग छवि का निर्माण हुआ है। राज्यव्यापी आंदोलन से कुशलता के साथ निबटना शिंदे को मराठाओं के प्रमुख नेता के तौर पर स्थापित कर गया है। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर उस तबके के बीच जो जातिगत अभिजात्य वर्ग की सत्ता के गलियारे में विशेष पकड़ की वजह से खुद को अलग-थलग महसूस करता रहा है। आंदोलन से निबटने के उनके प्रयासों के कारण ही नवंबर में मराठा आंदोलनकारी मनोज जरांगे-पाटील को समुदाय के लिए आरक्षण की मांग को लेकर अपना आंदोलन वापस लेना पड़ा था।

    पर इसमें कोई शक नही है कि शिंदे को राजनैतिक तौर पर प्रभावशाली मराठाओं और तेजी से उभरते अन्य पिछड़ा वर्ग के बीच संतुलन साधकर चलने में कई रोड़े आएगें। माना जाता है कि महाराष्ट्र में कुल आबादी में मराठा-कुनबी 31. 5 फीसद हैं, जबकि ओबीसी समुदाय 52 फीसद से अधिक है। यथार्थवादी अनुमानों के मुताबिक, कुनबियों को छोडक़र मराठाओं की आबादी 12 से 16 फीसद के बीच है। पर कुल ओबीसी की नाराजगी का खयाल रख पाना इतना आसान काम भी नही है।

    इसमें कोई शक नही है कि शिंदे ने मराठा आंदोलन को लेकर एक बहुत बड़ा जुआ खेला था। इसमें बड़ा रिश्क था। आंदोलन से पूरी सफलता के साथ निबटने की वजह से अब उनको मराठा समूह के एक बड़े जनाधार वाले नेता के तौर पर देखा जाने लगा है। शिंदे ने विरोध प्रदर्शनों से उपजी स्थिति का मुकाबला बहुत ही समझदारी या कहे कि बड़ी चालाकी से किया था। इस संकट की घड़ी में उनने भंवर में फसने की बजाय भंवर से निकलने में महारत दिखाई।

    सच तो ये है कि एकनाथ को इस रिश्क का अभी फायदा मिलते नजर आ रहा है। शिंदे के पक्ष में मराठाओं के किसी भी तरह लामबंद होने से सियासी जमीन मजबूत होती दिखाई दे रही है। बहरहाल, मुख्यमंत्री के पक्ष में मराठाओं की एकजुटता न केवल शिंदे की सियासी जमीन को मजबूत कर रही है बल्कि पूर्व बॉस से सियासी प्रतिद्वंद्वी बने उद्धव ठाकरे के प्रति सहानुभूति छीनने में भी मददगार साबित हो रही है। अब आगे क्या स्थिति बनेगी ये तो वक्त के गर्भ में है लेकिन इस समय शिंदे मराठाओं के बीच चहेते बन गए है और उधर दरगाह को लेकर ये बयान देकर कि- मैं सदियों पुरानी हाजी मलंग दरगाह- जिसके मंदिर होने का दक्षिणपंथी समूह दावा करते हैं- इसकी ‘मुक्ति’ के लिए प्रतिबद्ध हूं। खुद को हिंदू हितैषी साबित करने में भी बढ़त हासिल कर ली है।

    (ये लेखक के निजी विचार हैं)

    #EknathShinde #HinduMuslimPolitics #Maharashtra #PoliticalManeuvering #SanjayRokade Ma#rathaMovement
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