→ सफ़रनामा (2) – अरशिया परवीन
मैं राजस्थान हूं… क्या आप मुझे सच में जानते हैं??
हां! उतना ही जानते होंगे जितना आपने दूसरों से मेरे लिए सुना होगा…
हां मैं रेगिस्तान हूं, मेरा एक कोना रेत से भरा है…
इस नाम के अलावा भी मेरी एक पहचान है…
अगर सच में आप मेरे अन्तर्मन की सुंदरता देखना चाहते हैं तो आइये आज आपको अपने बारे में गहराई से बताता हूं।
मैं राजस्थान हूं वाकई मेरा एक छोर रेगिस्तानी है… तो मुझमें मेरा एक कोना चेरापूंजी भी है। मैंने अपने भीतर एक स्विट्जरलैंड को छुपा रखा है। कहीं देखें हैं 108 टापू (आईलैंड) आपने, जो मेरी माही नदी की पहचान हैं। अगर पाना चाहते हैं त्रिपुरा सुंदरी का आशीर्वाद और ज़ियारत करना चाहते हैं अब्दुल्ला पीर की।यकीन मानिए इस सफ़रनामे के आख़िर में आप यही कहेंगे “दुनिया में अगर कहीं जन्नत है तो बस यहीं है.. यहीं है.. यहीं है…
तो आइये आपको ले चलते हैं बांसवाड़ा…
राजस्थान पर्यटन विभाग द्वारा एक FAM ट्रिप आयोजित की गई जिसका मुख्य उद्देश्य राजस्थान के स्थापित पर्यटन स्थलों के अतिरिक्त अनेक पर्यटन स्थल ऐसे हैं जो अधिक स्थापित नहीं हुए हैं लेकिन उनकी प्राकृतिक सुंदरता रह-रह कर सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करती है। इस बार हम बात कर रहे हैं बांसवाड़ा जिले की जो केवल बांस के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है। इसे सौ द्वीपों का शहर और हरा शहर भी कहा जाता है। असल में माही नदी की गोद 108 टापू हैं जो नदी का जल स्तर कम होने के साथ दिखते हैं। बांसवाड़ा केवल प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के लिए भी जाना जाता है। 19 जुलाई को शुरू हुई बांसवाड़ा FAM ट्रिप में मुख्य पर्यटन स्थलों में चाचा कोटा की सैर की गई।
चाचा कोटा (सौ द्वीपों का शहर)
चाचा कोटा यह नाम सुनने में ही बहुत ही अलग सा लगता है बहुत से लोगों से इसके नाम के पीछे का रहस्य जानने की कोशिश की लेकिन किसी ने कुछ सही जवाब नहीं मिला। फ़िर मैंने ही अंदाजा लगाया की “शायद कोई आदिवासी चाचा कोटा गए थे या कोटा से कोई चाचा यहां आए थे” (हैं ना हंसने वाली बात) ।
चाचा कोटा तक पहुंचने के लिए दोनों और पहाड़ियों के बीच से गुज़रता हुआ रास्ता हमें यह एहसास दिलाता है कि हम राजस्थान में हैं या दक्षिण भारत के गांवों से गुजर रहे हैं। यकीन मानिए यहां अगर बॉलीवुड के प्रोड्यूसर व डायरेक्टर्स की नजरें इनायत हों जाएं तो राजस्थान में मिनी फिल्म सिटी यहीं से बननी शुरू हो। चाचा कोटा का सबसे विहंगम दृश्य हमें तब नज़र आता है जब यहां से माही नदी की सुंदरता को हम सबसे करीब से देखते हैं इस जगह को ही हंड्रेड आईलैंड यानी सौ द्वीपों का स्थान कहा जाता है।यहां छोटे बड़े सौ आईलैंड माही नदी में नज़र आते हैं जो किसी स्वर्ग सा एहसास कराते हैं। वो अलग बात है कि चाचा कोटा से जो थोड़ी दूरी जो थोड़ी ऊंचाई पर है वहां से सभी 100 आइलैंड नज़र नहीं आते। माही नदी का जल स्तर बढ़ने पर बहुत से आइलैंड नदी में डूब जाते हैं। माही नदी के आसपास के प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाना कोई आम बात नहीं है। वीकेंड पर चाचा कोटा में सैलानियों की भीड़ अधिक नज़र आती है चाचा कोटा से नीचे माही नदी की ओर जाने के लिए दोनों पहाड़ों के बीच घुमावदार रास्ते बने हुए हैं। जैसे-जैसे हम माही नदी की ओर बढ़ते हैं वैसे-वैसे माही नदी का सौंदर्य अपने चरम पर पहुंचता हुआ नज़र आता है। इतना खूबसूरत नज़ारा शायद ही राजस्थान में कहीं और देखने को मिलता होगा। आसपास के ग्रामीण आदिवासी अपनी रोजी रोटी हेतु माही नदी को ही अपना रोजगार बना रखा है जिस पर वह अपनी आजीविका के लिए नाव चलाते हैं और पर्यटकों को माही नदी के एक छोर से दूसरे छोर तक और माही नदी में बीच में नजर आने वाले दीपों पर ले जाते हैं। जहां से पर्यटक प्राकृतिक सौंदर्य को बहुत ही करीब से निहारते हैं। इस दृश्य को देखकर यकीनन ऐसा लगता है कि हम क्या वाकई रेगिस्तानी नाम वाले राजस्थान में है। या हम राजस्थान की किसी अलग ही दुनिया में आ गए हैं। यहां आने वाले पर्यटकों में गुजरात ,मध्य प्रदेश में आसपास के सैलानी देखने को मिलते हैं। इस ट्रिप की अगली कड़ी में हम आपको बता रहे हैं ऐसी ही कुछ और ख़ूबसूरत जगहों के बारे में…
माही बांध: माही बांध इसे माही बजाज सागर बांध भी कहा जाता है। इस बांध में 16 गेट हैं जो सितंबर माह में खोले जाते हैं। यह बांध राजस्थान का सबसे लंबा और दूसरा सबसे बड़ा बांध है। इसके द्वारा जल विद्युत उत्पादन और सिंचाई भी की जाती है। माही डैम अपने प्राकृतिक सौंदर्य और मनोरम दृश्यों के कारण एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। वीकेंड की वजह से आदिवासी महिलाओं की अधिकता देखने को मिली। उनकी पारंपरिक वेशभूषा और आभूषणों को करीब से देखने पर यह प्रतीत होता है कि आधुनिकता की बढ़ती हुई दौड़ में राजस्थान की असली सुंदरता ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिल सकती है। बांध के बैक वाटर में कई पहाड़ियां आंशिक रूप से डूबी हुई है जो छोटे-छोटे द्वीपों का सुंदर दृश्य बनाती है जिसके कारण इसे सिटी ऑफ हंड्रेड आइलैंड भी कहा जाता है। माही बांध का यही मनोरम प्राकृतिक दृश्य उन्हें अन्य बांधों से अलग दिखता है।
जगमेरू की खूबसूरत पहाड़ियां (जगमेरू हिल स्टेशन): इस हिल स्टेशन को देखकर वाकई ये यकीन होता है कि राजस्थान माउन्ट आबू के अलावा भी हिल स्टेशन है। बांसवाड़ा से लगभग 15 किमी दूर प्रकृति के अद्भुत और मंत्रमुग्ध कर देने वाली जगह जगमेरू हिल्स। यह विशेष रूप से मानसून के मौसम में और मानसून के बाद स्वर्ग जैसा दिखता है। मानसून के दौरान, यह चारों ओर हरी-भरी हरियाली से भर जाता है। साथ ही ऊपर जाते समय आपको कुछ प्राकृतिक अद्भुत नज़ारे दिखाई देंगे जो आपकी यादों में हमेशा आपके साथ रहेंगे। लगता ही नहीं कि हम पहाड़ी पर हैं। बड़े विशाल पहाड़ किसी मैदान से कम नहीं लगते। ऊपर एक हनुमान जी का प्राचीन मंदिर है, यहां कई स्थानीय लोगों और पर्यटक को इस प्राकृतिक सुंदरता के साथ समय बिताते हुए नज़र आते हैं। तेज़ और ताज़ी हवा के साथ, एक विशाल पहाड़ी मैदान और चारों ओर खूबसूरत हरी-भरी पहाड़ियां धरती पर स्वर्ग सा एहसास कराती हैं। वास्तव में आपको यहां के प्राकृतिक सौंदर्य से प्यार हो जाएगा।
मदारेश्वर महादेव मंदिर: बांसवाड़ा से कुछ दूरी पर स्थित मदारेश्वर महादेव एक ऐसा अविस्मरणीय अनुभव कराता है जो शायद आपको कहीं ओर नहीं होगा।राजस्थान के अब तक देखे गए धार्मिक पर्यटन स्थलों में मदारेश्वर सबसे अद्भुत स्थान है जहां आपको गंगा जमुनी तहज़ीब साक्षात देखने को मिलेगी।”मैं ही शिव – मैं ही पीर” वाक्य को सार्थक करता मदारेश्वर महादेव। जहां एक तरफ़ साक्षात स्वयंभू शिव और दूसरी और पीर बाबा की मज़ार। जहां एक तरफ़ शिव के जलाभिषेक किया जाता है वहीं दूसरी ओर बाबा को इत्र और फूलों से सुगंधित किया जाता है। जहां एक तरफ़ शिव के समक्ष दीप प्रज्जवलित किये जातें हैं वहीं दूसरी ओर बाबा के सामने चिराग़ रोशन होते हैं। जहां एक तरफ़ अष्टगंध से शिव का श्रृंगार किया जाता है वहीं दूसरी ओर बाबा को चादर से सजाया जाता है। जहां एक तरफ़ हमें शिव में लीन करती शिव स्तुति और दूसरी ओर कानों में घुलती कव्वाली की धुन। ऐसा अविस्मरणीय नज़ारा साक्षात आंखों से देखना असंभव सा लगता है। यही तो देश मेरे भारत की अखंड पहचान है।
इस अविस्मरणीय दृश्य को देखकर यह अनुभव होता है कि इस ब्रह्मांड को चलाने वाली केवल एक ही शक्ति है जिसके रूप और रंग अलग-अलग ज़रूर हो सकते हैं लेकिन शक्ति का वह रूप जो हमारे अंतर्मन को सुकून दे वही तो ईश्वर है। यहां आने वाले श्रद्धालु और जायरीन अपनी श्रद्धानुसार दोनों स्थानों पर नतमस्तक होते हैं। मदारेश्वर शिव मंदिर का इतिहास बहुत पुराना माना जाता है, स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर प्राचीन काल से यहां मौजूद है और इसका संबंध भगवान शिव की तपोभूमि से जोड़ा जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि यहां का शिवलिंग स्वयंभू है, यानी यह प्राकृतिक रूप से प्रकट हुआ है। “मदारेश्वर” नाम की उत्पत्ति भी रोचक है—यह “मदार”(पहाड़) और “ईश्वर”(शिव) से मिलकर बना है, जो इसकी पहाड़ी गुफा में स्थिति को दर्शाता है। वर्षों से यह स्थान आसपास के गांवों के श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। मदारेश्वर मंदिर की सबसे खास बात इसकी प्राकृतिक संरचना है। यह एक गुफा के भीतर स्थित है, जो अरावली पहाड़ियों के बीच बनी है। गुफा के बीच में एक प्राकृतिक शिवलिंग है, जिसके चारों ओर छोटी-छोटी नक्काशियां और जल का स्रोत हैं। इसकी वास्तुकला पूरी तरह से प्रकृति-निर्मित है, जिसमें कोई मानव-निर्मित भव्य संरचना नहीं है।
मंदिर तक पहुंचने के लिए पहाड़ी चढ़ाई करनी पड़ती है, जो यात्रियों के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव बन जाती है। इसकी तुलना अक्सर अमरनाथ यात्रा से की जाती है, खासकर इसके गुफा-आधारित स्थान के कारण। मदारेश्वर मंदिर स्थानीय लोगों और दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यह विशेष रूप से सावन के महीने और महाशिवरात्रि पर महत्वपूर्ण हो जाता है। श्रावण में कावड़ यात्रा का आरंभ इसी मंदिर से होता है, जो बेणेश्वर महादेव मंदिर (डूंगरपुर) तक जाती है। इस यात्रा के दौरान श्रद्धालु माही नदी से पानी लाते हैं और शिवलिंग पर अर्पित करते हैं।
त्रिपुरा सुंदरी मंदिर: त्रिपुरा सुंदरी मंदिर इसके नाम से ही प्रतीत होता है तीन माताओं का स्वरूप। मां सरस्वती, महालक्ष्मी , महाकाली, जितना इनके बारे में सुना उससे कहीं अधिक इनके दर्शन पाकर एक अविस्मरणीय अनुभव हुआ। सुना था त्रिपुरा सुंदरी को शक्तिशाली और सुंदर देवी माना जाता है और यह अनुभव भी किया। वास्तव में मंदिर के साथ-साथ आसपास के वातावरण में भी एक शक्तिशाली सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है। त्रिपुरा सुंदरी को माताबाड़ी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, यह पांचाल समुदाय की कुलदेवी हैं।
यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है और देवी पार्वती के अवतार, देवी त्रिपुर सुंदरी को समर्पित है। यह मंदिर 1501 ई. में महाराजा धन्य माणिक्य द्वारा बनवाया गया था और अपनी वास्तुकला और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है। तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध यह मंदिर बंगाली वास्तुकला शैली में बना है और कछुए के आकार की पहाड़ी पर स्थित है, जिसे कूर्म पीठ भी कहा जाता है। यहां नवरात्रि और दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
त्रिपुरा सुंदरी, जिसे ललिता, षोडशी, कामाक्षी और राजराजेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है, एक हिंदू देवी हैं जो मुख्य रूप से शक्तिवाद परंपरा में पूजी जाती हैं और दस महाविद्याओं में से एक के रूप में जानी जाती हैं। वह सर्वोच्च देवी, महादेवी के सार का प्रतीक हैं। शाक्त ग्रंथों में, ललिता को सर्वोच्च देवी के रूप में व्यापक रूप से प्रशंसा की गई है। त्रिपुरा सुंदरी को कई पूर्व राजघरानों की कुलदेवी माना जाता है, जिनमें सिंधिया वंश भी शामिल है। यह मंदिर राजनेताओं के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल भी है, जो देवी से आशीर्वाद लेने के लिए नियमित रूप से आते हैं। त्रिपुरा सुंदरी को “सत्ता की देवी” के रूप में भी जाना जाता है। बांसवाड़ा में मुख्य पर्यटन स्थलों के अतिरिक्त अन्य पर्यटन और धार्मिक स्थल हैं जिन्हें समय की उपलब्धता के अनुसार देखा जा सकता है। कागदी पिक अप वियर:-यह शहर से 3 किमी दूर रतलाम रोड पर स्थित मुख्य पर्यटक आकर्षण है।यह स्थान मुख्य रूप से अपनी प्राकृतिक सुंदरता, फव्वारों, उद्यानों और विशाल क्षेत्र में फैले पानी के लिए लोकप्रिय है।
आनंद सागर लेक: यह कृत्रिम झील शहर के पूर्वी हिस्से में स्थित है और इसका निर्माण महारावल जगमाल की रानी, इदर की लाची बाई ने करवाया था। शासकों की समाधियां या ‘छतरी’ पास ही स्थित हैं।
डाईलाब झील: इस खूबसूरत झील के किनारे पूर्व शासकों का ग्रीष्मकालीन निवास है। झील का एक बड़ा हिस्सा कमल के फूलों से ढका रहता है।
साई बाबा मंदिर: बांसवाड़ा में साईं बाबा का मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। यह श्री साईं बाबा को समर्पित है, जिन्हें भगवान शिव का अवतार माना जाता है। यह मंदिर कुछ ही दूरी पर स्थित एक पहाड़ी की चोटी पर बना है। इस मंदिर में मुख्य देवता के रूप में श्री साईं बाबा की संगमरमर की मूर्ति और काले पत्थर से बनी नंदी, कछुआ और गणेश की मूर्तियाँ हैं।
श्री राज मन्दिर: यह 16वीं सदी का महल, शहर के ऊपर स्थित है और एक बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। यह प्राचीन राजपूत वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह महल आज भी पूर्व राजपरिवार के स्वामित्व में है।
कल्पा वृक्ष: बाई तालाब झील के पास बड़े पैमाने पर कल्पवृक्ष वृक्षों की दुर्लभ प्रजातियां जोड़ी (राजा-रानी) में खड़ी हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे लोगों की इच्छाएं पूरी करते हैं।
समाई माता -भंडारिया: लगभग 400 सीढ़ियां चढ़ने पर आपको समाई माता का मंदिर मिलता है, जो एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। यह शहर से लगभग 4 किलोमीटर दूर एक खूबसूरत पिकनिक स्थल है।
अब्दुल्ला पीर: यह शहर के दक्षिणी भाग में स्थित अब्दुल रसूल, जिन्हें अब्दुल्ला पीर के नाम से भी जाना जाता है, की दरगाह है। हर साल बड़ी संख्या में लोग, खासकर बोहरा समुदाय के लोग, दरगाह पर होने वाले ‘उर्स’ में हिस्सा लेते हैं।
तलवाडा (15 किमी.): यह शहर प्राचीन सूर्य मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, सांभरनाथ जैन मंदिर, भगवान अमलिया गणेश, महालक्ष्मी मंदिर और द्वारकाधीश मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। तलवारा में सड़क किनारे कई सोमपुरा मूर्तिकार पत्थरों पर नक्काशी करते देखे जा सकते हैं
राम कुंड: इसे ‘फाटी खान’ भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ पहाड़ी के नीचे एक गहरी गुफा है। यहाँ साल भर बहुत ठंडे पानी का एक कुंड बना रहता है। कहा जाता है कि भगवान राम अपने वनवास के दौरान यहाँ आए थे और रुके थे। यह पहाड़ियों से घिरा एक खूबसूरत स्थान है।
अर्थुना (55 किमी.): अर्थुना और इसके आसपास के क्षेत्रों में कई प्रकार के समूह हैं। 11वीं, 12वीं और 15वीं शताब्दी के खंडहर हिंदू और जैन मंदिर। जीर्ण-शीर्ण खंडहरों के बीच शिव, पार्वती और गणेश की एक सुंदर नक्काशीदार संयुक्त मूर्ति है। अर्थुना के आसपास के लंकिया गाँव में शैव मंदिर हैं जिन्हें नीलकंठ महादेव मंदिर कहा जाता है। यह मंदिर एक पुराना पत्थर का मंदिर है जिसकी बाहरी दीवारों में सुंदर जटिल नक्काशी और महिलाओं की नक्काशीदार आकृतियाँ जड़ी हुई हैं। मंदिर के बरामदे में प्रवेश द्वार पर नंदी (भगवान शिव का प्रिय वाहन) पहरा देता है।
चींच (18 किमी.): यह गांव 12वीं शताब्दी के प्रसिद्ध ‘भगवान ब्रह्मा’ मंदिर के लिए जाना जाता है, जिसमें भगवान ब्रह्मा की औसत मनुष्य जितनी ऊंचाई की मूर्ति स्थापित है।
मानगढ़ धाम (80 किमी): गोविंद गुरु, भीलों के एक लोकप्रिय संत थे जिन्होंने मानगढ़ पहाड़ी को आस्था का केंद्र बनाया। उन्होंने भील समुदाय को जागृत किया और उनमें देशभक्ति की भावना भरी। भीलों को इससे इतनी प्रेरणा मिली कि उन्होंने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। बाद में, 1500 गुरुभक्त भीलों ने ब्रिटिश सेना के विरुद्ध लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। इसलिए इसे राजस्थान का जलियाँवाला बाग भी कहा जाता है।
अन्य धार्मिक पर्यटन स्थल: सिद्धि विनायक मंदिर, रघुनाथ मंदिर, द्वारकाधीश मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, वनेश्वर महादेव मंदिर, रविन्द्र ध्यान व परम आनंद आश्रम , भैरव मंदिर, विठ्ठल देव , नीलकंठ महादेव आदि।
-समाप्त