जयपुर। यूरोप के व्यस्त और आधुनिक शहर फ्रैंकफर्ट में मार्च की शाम एक अलग ही कहानी बयां कर रही थी। आधुनिक इमारतों और तेज रफ़्तार जिंदगी के बीच ऐसा माहौल बना, मानो लोग हजारों किलोमीटर दूर राजस्थान की धरती पर पहुंच गए हों। जर्मनी की धरती पर भारत की सांस्कृतिक धड़कन सुनाई दे रही थी और उस धड़कन का नाम था राजस्थान।
फ्रैंकफर्ट स्थित भारतीय दूतावास का सभागार 26 मार्च को सचमुच ‘मिनी राजस्थान’ में बदल गया, जहाँ मरुधरा की परंपराएँ, रंग, संगीत और पर्यटन संभावनाएँ एक साथ साकार हो उठीं क्योंकि वहां मनाया गया गणगौर उत्सव जो कि राजस्थान को लोक कला, संस्कृति व धार्मिक आस्था की सशक्त पहचान है।
‘राजस्थान पर्यटन दिवस’ के रूप में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम का संयुक्त आयोजन राजस्थान पर्यटन विभाग, राजस्थान फाउंडेशन और जर्मनी में सक्रिय प्रवासी संस्था राजस्थान संघ जर्मनी ने किया। इसका उद्देश्य स्पष्ट था संस्कृति के माध्यम से राजस्थान के पर्यटन अनुभवों को जर्मन समाज के सामने जीवंत रूप में रखना।
सभागार में प्रवेश करते ही राजस्थानी कला-सज्जा, पारंपरिक रंगों और लोकधुनों ने ऐसा वातावरण निर्मित किया कि उपस्थित अतिथियों को लगा मानो वे हजारों किलोमीटर दूर भारत के पश्चिमी छोर पर पहुँच गए हों। पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकारों ने लोकनृत्य प्रस्तुत कर घूमर की लय पर मरुधरा की सांस्कृतिक आत्मा को मंच पर उतार दिया। रंग-बिरंगे परिधान, तालबद्ध गतियाँ और लोकसंगीत की गूंज ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम में प्रजेन्टेशन के माध्यम से राजस्थान के किलों, हवेलियों, मरुस्थलीय विस्तार, वन्यजीव स्थलों और उत्सव-परंपराओं का परिचय कराया गया। यह केवल स्थलों की जानकारी नहीं थी, बल्कि उस जीवनशैली, परंपरा और अनुभव का परिचय था, जो राजस्थान पर्यटन को विशिष्ट बनाता है।
जर्मनी में बसे भारतीय समुदाय, जर्मन नागरिकों और पर्यटन क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने आयोजन को संवाद का रूप दिया। प्रवासी राजस्थानी समुदाय ने गणगौर उत्सव की झलकियों के माध्यम से सांस्कृतिक जुड़ाव को और गहरा किया। पूरा वातावरण राजस्थानी रंग में रंगा दिखाई दिया।
पर्यटन विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे आयोजन पर्यटन कूटनीति का सशक्त माध्यम होते हैं, जहाँ संस्कृति संवाद का रास्ता बनाती है और पर्यटन उस संवाद का परिणाम। फ्रैंकफर्ट में 26 मार्च को हुआ यह आयोजन इसी रणनीति की प्रभावी मिसाल बनकर उभरा है। यह कार्यक्रम बीत चुका है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक छाप और पर्यटन संदेश जर्मन समाज में अब भी गूंज रहा है।