→ सफ़रनामा – अरशिया परवीन
मेरा नाम सुनते ही आपके मन में मेरी रेगिस्तानी तस्वीर उभरने लगती है…
क्या मैं सच में रेतीला हूं?
क्या मेरा मन सच में सूखा है?
नहीं! मेरे अंदर छुपी सुंदरता को अगर देखना है तो आपको मेरी रेगिस्तानी छवि से बाहर निकल कर मेरी भीतरी सुंदरता को देखना होगा… यक़ीनन आपको कुछ ऐसा दिख जाए जो धरती पर स्वर्ग का एहसास करा दे…
राजस्थान के भीतर छुपी सुंदरता को देखने का अवसर दिया राजस्थान पर्यटन विभाग की ओर से आयोजित FAM ट्रिप ने…
यह यात्रा शुरू हुई 17 जुलाई से 20 जुलाई तक रही… इस यात्रा का उद्देश्य डूंगरपुर और बांसवाडा जिलों में छिपे पर्यटन स्थलों को देखना और उन्हें पर्यटकों के दिलों तक पहुंचाना…
17 जुलाई से शुरू हुई इस यात्रा में हमारा दल जयपुर से चित्तौड़गढ़, उदयपुर के रास्ते मानसून का आनन्द लेते हुए अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के मनोरम दृश्य को देखता हुआ डूंगरपुर पहुंचा… 18 जुलाई को डूंगरपुर के मुख्य पर्यटन और धार्मिक स्थलों की यात्रा की गई ।
ऋषभदेव (केसरिया जी)
यह मंदिर राजस्थान के उदयपुर जिले के ऋषभदेव (धुलेव) कस्बे में स्थित है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों के प्रथम तीर्थंकर का प्रसिद्ध मंदिर है जो केवल दिगंबरों का ही नहीं बल्कि श्वेतांबरों का भी आस्था का केंद्र है। इस मंदिर की सबसे बड़ी सुंदरता देखने को तब मिली जब वैष्णव, शैव और आदिवासी भी इस मंदिर में अपनी पूजा अर्चना उसी आस्था के साथ करने आते हैं जो इसे बाकी तीर्थंकरों के मंदिरों से अलग दिखती है…। मंदिर में 52 शिखर हैं, जो नंदीश्वर द्वीप के 52 जिनालयों (जैन मंदिरों) का प्रतीक हैं। मंदिर में भगवान ऋषभदेव की काले पत्थर से बनी 3.5 फीट ऊंची पद्मासन मुद्रा में प्रतिमा स्थापित है। मंदिर की दीवारों, मेहराबों, द्वारों और शिखर पर उत्कृष्ट कलाकारी की गई है। यह मंदिर 1500 वर्ष से भी अधिक प्राचीन माना जाता है।
मंदिर में एक 800 साल पुराना रथ है, जिसका उपयोग वार्षिक रथोत्सव के दौरान किया जाता है। ऋषभदेव जी को केसरिया जी भी कहा जाता है क्योंकि यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां प्रतिमा का केसर से श्रृंगार किया जाता है….। इस मंदिर के निर्माण में संगमरमर का बहुत ही खूबसूरती से उपयोग किया गया है जो इसकी सुंदरता को और भी बढ़ा देते हैं। डूंगरपुर यात्रा की अगली कड़ी में गेप सागर झील जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहती है।
गेप सागर झील: तीन ओर से गेप सागर झील का विहंगम दृश्य और उसके एक छोर पर बने बादल महल इसकी सौंदर्यता को और भी बढ़ा देते हैं। बादल महल के म्यूजियम में वागड़, मेवाड़,मालवा ग्रामीण क्षेत्र की दुर्लभ कलाकृतियां ,चित्रशैली , वेशभूषा, पाषाण शिल्प के साथ दर्पण, लोक वाद्य यंत्र आदि देखने को मिलते हैं जो ग्रामीण क्षेत्र की संस्कृति को करीब से देखने का एहसास करते हैं। मानसून के समय में गेप सागर झील के आसपास के प्राकृतिक दृश्य और भी मनोरम हो जाते हैं जो इसे सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाते हैं।
जूना महल: FAM यात्रा की अगली कड़ी में (जूना महल) सैलानियों का ध्यान खींचता है… जूना महल 13वीं शताब्दी में बनाया गया था। पुराने इस किले तक जाने के लिए पुराने डूंगरपुर शहर की पहाड़ियों के बीच बने रास्तों से होते हुए किले तक पहुंचना एक रोमांचक एहसास कराता है। जूना महल डूंगरपुर, राजस्थान के प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में गिना जाता है।
जूना महल सफ़ेद रंग के पत्थरों से बनाया गया है, जो देखने में काफ़ी शानदार है। इस महल की विशालता को देखते हुए यह महल से अधिक क़िला प्रतीत होता है। यह प्राचीन महल पास की धनमता पहाड़ी की तलहटी पर स्थित है। अतीत से जुड़े पन्नों के मुताबिक़ यह महल 700 साल से भी पुराना है, जो अपने ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। पहले इसे ‘बड़ा महल’ या ‘पुराना महल’ कहकर पुकारा जाता था। जूना महल का निर्माण तब हुआ था, जब मेवाड़ के शासक वंश के लोगों ने अलग होकर यहां अपना साम्राज्य स्थापित किया। जानकारी के अनुसार इस महल को बनाने की शुरूआत रावल वीरसिंह देव ने की थी। इस महल के महत्व को समझने के बाद उनके बेटे रावल भुचंद ने इस महल में डुंगरपुर राज्य की राजधानी स्थानांतरित कर दी थी, जिसके बाद यह डूंगरपुर की सभी गतिविधियों का केंद्र बन गया था।
महल के बाहरी क्षेत्र में बने आने-जाने के संकर रास्ते दुश्मनों से बचाव के लिए बनाए गए थे। इस महल के अंदर की सजावट में कांच, शीशों और लघु चित्रों का प्रयोग किया गया था। जूना महल की दीवारों और छतों पर डूंगरपुर के इतिहास और 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच राजा रहे व्यक्तियों के चित्र उकेरे गए हैं।
जूना महल में नौ फ्लोर है प्रथम तल पर हाथी चौक है उस स्थान पर शाही हाथी पर डूंगरपुर राजा सीधे हाथी पर बिराजते थे। संकरी सीढ़ियों के रास्ते चढ़ते हुए किले की सुंदरता को करीब से देखा जा सकता है। दरबार हॉल में बिछे कालीन और राजा डूंगरपुर की शाही बैठक आज भी प्राचीन समय को याद दिलाती है। जलेब चौक की सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हुए बारादरी में पहुंचने पर उसमें बने हुए 12 खूबसूरत दरवाजे नज़र आते हैं जहां से बाहर देखने पर चारों ओर से डूंगरपुर की सुंदरता को देखा जा सकता है। तोशाखाना जिसमें अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र अभी भी सहेज के रखे हुए हैं। आम और खास से गुज़रते हुए रानी महल में बनी सुंदर चित्रकला,मंदिर में लिखे श्लोक , शीशे से बारीक काम से बनी दीवारें , रंग बिरंंगे चित्र , भित्ति चित्र इस किले के हर कोने को जागृत करते हैं वहीं पास में बने रानी महल में राधा कृष्ण के अद्भुत चित्र इसकी सौंदर्यता को बढ़ाते हैं।
राजा महल में बनी खूबसूरत कलाकृतियां और किले के हर कोने से खिड़की से झांकने पर डूंगरपुर की खूबसूरती का एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है चारों ओर पहाड़ों के बीच बने जूना महल की हर दीवार अपने इतिहास को जीवित रखती है किले के शीर्ष पर जाकर देखने से डूंगरपुर की सुंदरता को और भी करीब से देखा जा सकता है। जूना महल वर्तमान में राजपरिवार की निजी संपत्ति है।
फतेहगढ़ी: FAM यात्रा की अगली घड़ी में डूंगरपुर स्थित फतेहगढ़ी की ओर प्रस्थान किया गया… फतेहगढ़ी के विहंगम रास्ते में घुमावदार पहाड़ियों पर बनी मूर्तियां पर्यटकों को आकर्षित करती हैं… घुमावदार पहाड़ी पर रामायण के अलग-अलग पात्रों की बनी मूर्तियां पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहती हैं जो पर्यटकों को रामायण की पूरी कहानी बताती हैं…
फतेहगढ़ी पर ऊपर पहुंचने पर श्री हनुमान मंदिर के दर्शन होते हैं फतेहगढ़ी से डूंगरपुर का असली सौंदर्य देखने को मिलता है जहां चारों ओर पहाड़ियों से गिरा डूंगरपुर राजस्थान के किसी शिमला होने से कम नहीं लगता। मानसून में हरीतिमा से खिलखिलाती पहाड़ियां और उसके आसपास के विहंगम दृश्य डूंगरपुर को अन्य पर्यटन स्थलों से अलग दिखते हैं यहां आने वाले सैलानियों में राजस्थान ,गुजरात , मध्य प्रदेश व विदेशी सैलानियों की अधिकता रहती है। डूंगरपुर में इसके अलावा और भी धार्मिक पर्यटन स्थल हैं जहां आदीवासी संस्कृति को करीब से देखा जा सकता है।
बेनेश्वर धाम: बेणेश्वर मंदिर, जिसमें इस क्षेत्र का सबसे पूजनीय शिव लिंग है, इस स्थान को त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है। जो सोम ,जाखम और माही नदियों के संगम पर बना है। माना जाता है कि लिंग स्वयंभू है या स्वयं निर्मित है। यह पांच फीट ऊंचा है और शीर्ष पर पांच भागों में टूटा हुआ है। बेणेश्वर मंदिर के पास ही विशु मंदिर है, जिसका निर्माण 1793 ई. में जनकुंवरी ने करवाया था, जो मावजी की पुत्रवधू थीं। मावजी एक अत्यंत पूजनीय संत थे और उन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता था। कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण उस स्थान पर किया गया था जहां मावजी ने अपना समय भगवान की प्रार्थना में बिताया था।
गलियाकोट: माही नदी के तट पर बसा गलियाकोट लगभग 2000 निवासियों वाला एक छोटा सा गाँव है। यह गाँव सैयदी फखरुद्दीन की दरगाह के कारण प्रसिद्ध है। वार्षिक उर्स में यहाँ हज़ारों श्रद्धालु आते हैं। मज़ारी फ़ख़री, जो कि संत की समाधि है। यह संगमरमर से निर्मित है। महिलाएं प्रार्थना कक्ष के दोनों ओर विशेष रूप से उनके लिए बनाई गई बालकनियों से प्रार्थना करती हैं।
भुवनेश्वर: यह डूंगरपुर तहसील के कनबा गाँव के पास सड़क किनारे एक शिव मंदिर है। यहाँ हर साल होली के पाँचवें दिन मेला लगता है।
देव सोमनाथ: सोम नदी के तट पर, 12वीं शताब्दी में निर्मित देव सोमनाथ नामक एक पुराना और सुंदर शिव मंदिर है। सफेद पत्थर से निर्मित इस मंदिर में भव्य बुर्ज हैं। मंदिर के भीतर से आकाश देखा जा सकता है। यद्यपि चिनाई में भागों का एकदम सही अनुकूलन है, फिर भी यह आभास देता है कि पत्थर टूट रहे हैं। मंदिर में 3 निकास हैं, प्रत्येक पूर्व, उत्तर और दक्षिण में। प्रवेश द्वार दो मंजिला हैं। गर्भगृह में एक ऊंचा गुंबद है। इसके सामने 8 राजसी स्तंभों पर निर्मित सभा मंडप है। बीस तोरण हैं जिनमें से चार अभी भी मौजूद हैं। डूंगरपुर के आसपास की धार्मिक पर्यटन स्थल जिन्हें समय की उपलब्धता के अनुसार देखा जा सकता है वो हैं नागफनी मंदिर, आशापुरा मंदिर, अमझरा, भीलूड़ा, गोरेश्वर, बोरेश्वर, चूंडावाला महल, बड़ौदा मंदिर, विजवा माता आदि।
मेले और त्यौहार
डूंगरपुर में हर वर्ष आदिवासी अपनी संस्कृति से जुड़े मेले त्यौहार धूमधाम से मनाते हैं….जिसे देखने के लिए आस पास के सभी आदिवासी यहां शामिल होते हैं…इन मेलों की वजह से हमें आदिवासी संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिलता है।
वागड़ महोत्सव: यह महोत्सव पर्यटन विभाग एवं जिला प्रशासन डूंगरपुर द्वारा प्रतिवर्ष अक्टूबर-नवंबर माह में आयोजित किया जाता है।
बेणेश्वर मेला: माही, सोम और जाखम नदियों के संगम पर स्थित बेणेश्वर में आयोजित होने वाला सबसे बड़ा आदिवासी मेला। राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश से बड़ी संख्या में आदिवासी मृतकों की अस्थियों को विसर्जित करने के लिए एकत्रित होते हैं। यह मेला फरवरी माह में माघ पूर्णिमा को आयोजित होता है, जिसे इस क्षेत्र में एक पवित्र काल माना जाता है। रंग-बिरंगे आदिवासी परिधान, आभूषण और लोक नृत्य देखने लायक होते हैं।
घोटियाम्बा मेला: यह रंगारंग मेला हर साल चैत्र सुदी अमावस्या से मार्च के आसपास आयोजित होता है। भील जनजाति के लोग यहाँ एक मंदिर के पास स्थित कुंड में पवित्र स्नान करने के लिए एकत्रित होते हैं, जहाँ पांडवों की मूर्तियाँ स्थापित हैं। यहाँ की अनूठी आदिवासी संस्कृति इसका मुख्य आकर्षण है।
मानगढ़ फेयर: यह महत्वपूर्ण मेला मार्गशीर्ष पूर्णिमा को आयोजित होता है, जहाँ राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के आदिवासी एकत्रित होते हैं और सम्प सभा के संस्थापक गोविंद गुरु को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। हमारी इस यात्रा का यही उद्देश्य है कि पर्यटक उदयपुर, चित्तौड़ से आगे निकलकर डूंगरपुर की सौन्दर्यता को देखें और इसकी प्राकृतिक सुंदरता को विश्व स्तर तक पहुंचा सकें…
…जारी।
अर्शिया परवीन द्वार लिखित सफरनामा का दूसरा भाग शीघ्र