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    जब चार पीढ़ियां आईं एक मंच पर, भावुक हुआ पूरा राजस्थान
    टूरिज्म

    जब चार पीढ़ियां आईं एक मंच पर, भावुक हुआ पूरा राजस्थान

    Shivani SrviastavaBy Shivani SrviastavaJune 4, 2026No Comments5 Mins Read
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    नागौर। राजस्थान अपनी सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक परंपराओं के लिए देश दुनिया में पहचान रखता है। इन दिनों या प्रदेश अपनी एक अनूठी व सदियों पुरानी परंपरा को पुनः जीवित करने में जुटा है। यह परंपरा परिवार की बेटियों से जुड़ी है। प्रदेश में इन दिनों बाईसा मिलन समारोह का आयोजन प्रदेश के सुदूर गांवों में जीवंत हो रहें हैं, जिसके तहत पूरा गांव देश व विदेश में बसी अपनी बहनों और बेटियों को घर आने का न्यौता देते हैं और उनके आने पर उनके स्वागत व सत्कार में गांव व आस पास के हजारों परिवार पलक-पावणे विछाकर स्वागत करते हैं। इस मॉडल ने राजस्थान पर्यटन विभाग के ध्येय वाक्य पधारो म्हारे देश को आत्मसात करते हुए इसे नया स्वरूप दे दिया है जिसमें कहा जा रहा है ‘आवो नी पधारो आपणे देश..’

    समारोह के दौरान कालबेलिया, चरी और कच्छी घोड़ी जैसे लोकनृत्यों की प्रस्तुतियों ने राजस्थान की रंग-बिरंगी संस्कृति को जीवंत कर दिया। मशक वादन और लोकगीतों की स्वर लहरियों ने यह अहसास कराया कि राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर गांवों के जीवन में आज भी धड़क रही है।

    इसी तरह का एक आयोजन नागौर जिले के गोटन में हाल ही में संपन्न हुआ। इस समारोह में दिल्ली, मुंबई, पुणे, चैन्नई से लेकर कनाड़ा तक में बसी गांव की बेटियों ने अपनी उपस्थित दर्ज करवाई साथ ही यह भी जता दिया की बाबुल का घर… छूटता नहीं है.. उन्हें सम्मान से बुलाया जाए तो बेटियां सात समन्दर पार से भी अपने घर आती हैं।

    बहन, बेटी, बुआ और मौसी व भाभी की भूमिका में अपने घर पधारी सभी बेटियों चेहरे पर संतोष की झलक व बचपन के दिनों को फिर जीने की चाह ने बाईसा समारोह को राजस्थान का अघोषित ग्रामीण पर्यटन का स्वरूप भी दे दिया है। यह दो दिवसीय बाईसा स्नेह मिलन समारोह इसी जीवंत विरासत का ऐसा उदाहरण बनकर उभरा, जहां एक ही मंच पर परिवारों की चार पीढ़ियां दादी, मां, बेटी और नातिन एक साथ उपस्थित रहीं। यह दृश्य केवल एक पारिवारिक मिलन नहीं था, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक निरंतरता, महिला सम्मान और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक था।

    इस समारोह के जरिए यह संदेश भी स्पष्ट किया गया की राजस्थान की पहचान उसके भव्य किलों, राजमहलों और ऐतिहासिक धरोहरों के साथ साथ उन सामाजिक परंपराओं में है जो पीढ़ियों को एक सूत्र में बांधती हैं और समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखती हैं। ग्रामीण पर्यटन, सांस्कृतिक विरासत और महिला सशक्तिकरण के त्रिवेणी संगम के रूप में उभरे इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि राजस्थान की सबसे बड़ी धरोहर उसके स्मारक नहीं, बल्कि उसके लोग, उनकी परंपराएं और पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक संवेदनाएं हैं। यही वह अनुभव है जिसकी तलाश आज दुनिया भर के पर्यटक कर रहे हैं।

    गांव की चौपाल से वैश्विक पर्यटन तक
    राजस्थान पर्यटन विभाग के संयुक्त निदेशक दलीप सिंह राठौड़ के अनुसार जब पर्यटन विशेषज्ञ ‘एक्सपीरियंस टूरिज्म’ और ‘कम्युनिटी बेस्ड टूरिज्म’ की बात करते हैं, तो उसका वास्तविक स्वरूप गोटन जैसे आयोजनों में दिखाई देता है। यहां पर्यटक केवल दर्शक नहीं बन सकता, बल्कि वह स्थानीय संस्कृति, लोक परंपराओं, सामाजिक रिश्तों और सामुदायिक जीवन का सहभागी बन सकता है।

    बेटियों के सम्मान का उत्सव
    बाईसा स्नेह मिलन का मूल भाव बेटियों और महिलाओं का सम्मान था। बहन-बेटियों का चुंदड़ी ओढ़ाकर, पुष्पवर्षा कर और पारंपरिक रीति-रिवाजों से स्वागत किया गया। यह सम्मान केवल रस्म नहीं था, बल्कि उस सामाजिक सोच का प्रतीक था जिसमें महिला को परिवार, समाज और संस्कृति की आधारशिला माना जाता है। वक्ताओं ने बालिका शिक्षा, महिला आत्मनिर्भरता और सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी समाज का भविष्य उसकी बेटियों के सशक्त होने पर निर्भर करता है।

    चार पीढ़ियों का दुर्लभ संगम
    आयोजन का सबसे भावुक और प्रेरणादायक दृश्य वह रहा, जब एक ही मंच पर चार पीढ़ियां एक साथ उपस्थित रहीं। परंपरागत परिधानों में सजी बुजुर्ग महिलाओं से लेकर नई पीढ़ी की बालिकाओं तक, सभी ने यह संदेश दिया कि समय बदल सकता है, लेकिन संस्कार और सामाजिक मूल्य पीढ़ियों को जोड़ने का काम करते हैं। आज जब शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण संयुक्त परिवारों की अवधारणा कमजोर होती जा रही है, ऐसे आयोजन सामाजिक संबंधों को पुनर्जीवित करने का कार्य कर रहे हैं। यही राजस्थान की वह अमूर्त सांस्कृतिक विरासत यानी इनटेनजिबल हैरिटेज है जिसे दुनिया देखने और समझने के लिए उत्सुक है।

    पर्यटन का नया मॉडल
    पर्यटन विशेषज्ञ महेंद्र सिंह राठौड़ का कहना है कि राजस्थान पर्यटन अब केवल स्मारकों और विरासत भवनों तक सीमित नहीं है। भविष्य का पर्यटन उन अनुभवों पर आधारित होगा जो पर्यटकों को स्थानीय समाज से जोड़ें। गोटन का यह आयोजन बताता है कि यदि ऐसे सामुदायिक उत्सवों को पर्यटन कैलेंडर का हिस्सा बनाया जाए तो ग्रामीण राजस्थान वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर एक नई पहचान बना सकता है।

    विरासत जो भविष्य गढ़ती है
    बाईसा स्नेह मिलन समारोह के आयोजन से जुड़े डॉ. वी.एस. राठौड़ व ऋषिराज सिंह के अनुसार इस आयोजन ने यह साबित किया कि राजस्थान की संस्कृति केवल इतिहास की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान में जी जाने वाली जीवनशैली है। यहां लोकनृत्य केवल मनोरंजन नहीं, लोक स्मृति हैं चुंदड़ी केवल परिधान नहीं, सम्मान का प्रतीक है और चार पीढ़ियों का एक मंच पर होना केवल पारिवारिक तस्वीर नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक विरासत का जीवंत दस्तावेज है जिसने सदियों से राजस्थान को विशिष्ट बनाया है।

    उन्होंने कहा कि गोटन का यह आयोजन एक संदेश देकर समाप्त हुआ की जब बेटियों का सम्मान, महिलाओं का नेतृत्व और परंपराओं का संरक्षण एक साथ आगे बढ़ते हैं, तभी समाज और संस्कृति दोनों समृद्ध होते हैं। यही राजस्थान की वास्तविक पहचान है, और यही उसकी सबसे बड़ी पर्यटन संपदा भी है।

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    Shivani Srviastava

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