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    अविश्वास प्रस्ताव या विपक्ष की बेबसी? संसद में 12 घंटे की बहस ने खड़े किए बड़े सवाल
    राजनीति

    अविश्वास प्रस्ताव या विपक्ष की बेबसी? संसद में 12 घंटे की बहस ने खड़े किए बड़े सवाल

    Shivani SrviastavaBy Shivani SrviastavaMarch 16, 2026No Comments6 Mins Read
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    हर्षिता
    एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट

    भारतीय संसदीय लोकतंत्र के गौरवशाली इतिहास में अविश्वास प्रस्ताव को सदैव एक अत्यंत गंभीर और उत्तरदायी संवैधानिक माध्यम माना गया है। यह वह अवसर होता है जब विपक्ष अपनी वैकल्पिक नीतियों और ठोस तर्कों के साथ सरकार को कटघरे में खड़ा करता है। किंतु, लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध कांग्रेस द्वारा लाया गया हालिया अविश्वास प्रस्ताव राजनीतिक परिपक्वता के बजाय वैचारिक शून्यता और रणनीतिक दिवालियापन का प्रदर्शन अधिक प्रतीत हुआ।

    करीब बारह घंटे की मैराथन बहस में विपक्षी नेताओं ने अपनी पूरी शक्ति झोंक दी और सरकार पर अनर्गल आरोप मढ़े, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि स्वयं नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इस महत्वपूर्ण चर्चा के दौरान प्रभावी भूमिका निभाने के बजाय रणनीतिक रूप से निष्प्रभावी और उदासीन नजर आईं।

    यह कांग्रेस की एक बड़ी रणनीतिक विफलता ही थी कि जिस आसन पर उन्होंने पक्षपात का गंभीर आरोप लगाया था, उस पर बहस के दौरान उनके पास कोई ठोस और विधिसम्मत आधार नहीं था। सदन में केवल संख्या बल की उपस्थिति मात्र से संसदीय दायित्व पूर्ण नहीं हो जाता। जब सबसे तीखी आपत्ति कांग्रेस को ही थी, तब यह अनिवार्य था कि उनके सर्वोच्च नेतृत्व को सबसे आगे बढ़कर मोर्चा संभालना चाहिए था। किंतु, मुख्य विमर्श के समय राहुल गांधी की तैयारी का स्पष्ट अभाव और उनकी निष्क्रियता ने देश के सामने यह सिद्ध कर दिया कि विपक्ष के पास विरोध के लिए स्वर और शोर तो पर्याप्त है, पर तथ्यों का कोई ठोस धरातल नहीं है।

    ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस अपने ही नेता के माध्यम से स्वयं को आईना दिखाने का कार्य कर रही है, क्योंकि संभवतः उनके पास कहने के लिए कुछ सार्थक था ही नहीं।

    गृहमंत्री अमित शाह ने सदन के पटल से विपक्ष की इसी कार्यशैली और उनके आचरण पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने अकाट्य तथ्यों के साथ यह स्पष्ट किया कि ‘बोलने नहीं दिया जाता’ का विलाप केवल एक राजनैतिक ढाल है। वास्तविकता यह है कि जब भी राष्ट्रहित के विषयों पर गंभीर चर्चा का अवसर आता है, नेता प्रतिपक्ष या तो विदेश में रहते हैं या संसदीय मर्यादा के अनुकूल आचरण नहीं करते। अमित शाह द्वारा राहुल गांधी के उन पूर्ववर्ती आचरणों का स्मरण कराना विपक्ष को इतना नागवार गुजरा कि वे तथ्यों का उत्तर देने के बजाय शोर मचाने लगे। सदन में आंख मारना, प्रधानमंत्री के पास जाकर जबरन गले मिलना और फ्लाइंग किस उछालना जैसी हरकतें किसी भी गंभीर राजनेता की गरिमा के अनुकूल नहीं मानी जा सकतीं। गृहमंत्री के भाषण के दौरान विपक्ष का शोर इस बात का प्रमाण है कि विपक्ष अब स्वस्थ बहस के बजाय हंगामे को ही अपनी एकमात्र उपलब्धि मानने लगा है।

    गौरतलब है कि विपक्ष द्वारा कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को लेकर लगाए जा रहे आरोप केवल उनकी वैचारिक संकीर्णता और भारत की बढ़ती वैश्विक शक्ति के प्रति उनके संशय को ही दर्शाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत आज उस वैश्विक ऊंचाई पर है, जहाँ वह किसी भी देश के दबाव में आए बिना, केवल अपने राष्ट्रहितों के आधार पर निर्णय लेता है। इसकी प्रत्यक्ष पुष्टि हालिया कूटनीतिक सफलता से होती है, जहाँ पश्चिम एशिया में जारी भारी तनाव के बावजूद भारत के प्रभावी हस्तक्षेप के बाद ईरान ने भारतीय ध्वज वाले एलपीजी टैंकरों को होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित गुजरने की विशेष अनुमति दी।

    यह प्रधानमंत्री की वैश्विक नेतृत्व क्षमता और व्यक्तिगत संवाद का ही परिणाम है कि संकट के समय में भी भारत की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित है। कूटनीति सतही बयानों से नहीं, बल्कि उस विश्वसनीय साख से चलती है, जिसे आज पूरी दुनिया सम्मान की दृष्टि से देख रही है। ऊर्जा सुरक्षा और गैस की किल्लत जैसा अफवाह खड़ा करने वाली कांग्रेस को अपना वह काला इतिहास खंगालना चाहिए जब देश की जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसती थी। वह दौर किसी से छिपा नहीं है जब एक आम गृहिणी को एक गैस सिलेंडर के लिए घंटों लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता था और नौ या बारह सिलेंडरों के सीमित कोटे के लिए संघर्ष करना पड़ता था।

    किसानों को यूरिया प्राप्त करने हेतु पुलिस की लाठियां खानी पड़ती थीं और देश के विभिन्न शहरों में बम धमाके एक ‘नियमित सिलसिला’ बन चुके थे। इसके विपरीत, आज वैश्विक युद्धों के बीच भी भारत की स्थिति स्थिर और मजबूत है। उसके उलट आज पड़ोसी देश पाकिस्तान की स्थिति सबके सामने है, जहां पेट्रोल की कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं।

    यदि आज केंद्र में मोदी सरकार के बजाय कांग्रेस होती तो देश की क्या स्थिति होती उसकी कल्पना की जा सकती है। तथ्यात्मक और ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो 1973 के अरब-इजरायल युद्ध के दौरान उत्पन्न वैश्विक तेल संकट के समय भारत की विवशता जगजाहिर थी, जब कीमतों में बेतहाशा वृद्धि ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी। इसके विपरीत, अटल बिहारी वाजपेयी जी ने 2003 में ‘रणनीतिक तेल रिजर्व’ का दूरदर्शी विजन रखा था, जिसे कांग्रेस ने अपने दस साल के शासनकाल में केवल फाइलों तक सीमित रखा। 2014 के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने इसे प्राथमिकता के साथ धरातल पर उतारा।

    आज भारत के पास विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पदुर में लगभग 53.3 लाख टन का अभेद्य रणनीतिक तेल रिजर्व है, जो तेल कंपनियों के पास उपलब्ध स्टॉक के साथ मिलकर देश को संकट काल में लगभग 75 दिनों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करता है। यह स्पष्ट अंतर है उस नेतृत्व में जो देश को अभावों में रखना चाहता था और उस नेतृत्व में जो भारत को भविष्य की चुनौतियों के लिए आत्मनिर्भर बना रहा है।

    सौ बात की एक बात यह है कि कांग्रेस और उसके सहयोगियों के लिए अब राष्ट्रहित से ऊपर अकारण विरोध का संकीर्ण एजेंडा हो गया है। भारत की वैज्ञानिक प्रगति हो या रक्षा उपलब्धियां, विपक्ष हर उस गौरव को नकारने के प्रयास में लगा है जिस पर पूरी दुनिया भारत की सराहना कर रही है। सत्ता के मोह में वे इस सत्य को विस्मृत कर चुके हैं कि राष्ट्र सदैव सर्वोपरि होता है। वर्तमान विपक्ष की यह निरंतर बढ़ती नकारात्मकता उन्हें एक ऐसे रास्ते पर ले जा रही है जहां वे केवल एक अनुत्तरदायी और राष्ट्र विरोधी नैरेटिव की वाहक बनकर रह गई हैं। यह देश का दुर्भाग्य है कि उसे ऐसा विपक्ष मिला है जिसके लिए अपनी पीढ़ियों की आर्थिक मजबूती ही प्राथमिकता है, राष्ट्र नहीं।

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    Shivani Srviastava

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