→ सोनल जैन
मैं राजस्थानी पगड़ी हूँ। मेरे रंगों में मरुधरा की संस्कृति, मेरे पेचों में परंपराओं की गहराई और मेरी तहों में सदियों का इतिहास समाया है। मैं केवल सिर पर बांधा जाने वाला वस्त्र नहीं, बल्कि सम्मान, स्वाभिमान और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक हूँ। मैंने बदलते समय के साथ राजस्थान को बदलते देखा है, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान को आज भी सहेज रखा है। राजस्थान के अलग-अलग अंचलों में मेरी पहचान अलग है। कहीं मैं पाग हूँ, कहीं साफा, कहीं पेचा तो कहीं पोतियो। मारवाड़, मेवाड़, जयपुर, जैसलमेर, जालौर और सिरोही में मेरे रंग, कपड़े और बांधने के तरीके बदल जाते हैं। कहा जाता है कि राजस्थान में बारह कोस पर बोली बदलती है मेरी बांधने की शैली भी इसी तरह क्षेत्र के साथ अपना रूप बदलती है। यही विविधता मुझे राजस्थान की जीवंत सांस्कृतिक पहचान बनाती है।
रंगों में रची ऋतुएँ और परंपराएँ
मैं मौसम और अवसर के अनुरूप रंग धारण करती हूँ। बसंत में गुलाबी, सावन में लहरिया, फाल्गुन में फागुनिया और मांगलिक अवसरों पर केसरिया रंग में सजती हूँ। विवाह समारोहों में मेरा मोठड़ा रूप विशेष पहचान रखता है। शोक के अवसरों पर सफेद और अन्य पारंपरिक रंगों के माध्यम से मैं गंभीरता और संवेदना व्यक्त करती हूँ। मेरे रंग महज सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि राजस्थान के लोकजीवन की सांकेतिक भाषा हैं। वे ऋतु, उत्सव, सामाजिक परंपरा और भावनाओं का परिचय देते हैं। मेरी यही विशेषता लोकसंस्कृति को समझने की एक अनूठी दृष्टि प्रदान करती है। मेरी उपयोगिता भी मेरी सुंदरता जितनी ही महत्त्वपूर्ण है। राजस्थान की तपती धूप में मैं सिर को गर्मी से बचाती हूँ। जरूरत पड़ने पर मेरा लंबा कपड़ा पानी खींचने के लिए रस्सी या अन्य घरेलू कामों में भी इस्तेमाल होता रहा है। इस तरह मैं परंपरा, शिल्प और व्यावहारिक जीवन का सहज संगम हूँ।
मान-सम्मान की पहचान
राजस्थान में मेरी प्रतिष्ठा व्यक्ति के सम्मान से जुड़ी है। मेरी अवमानना को व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर आघात माना जाता रहा है। इतिहास में मेरे सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष हुए, तो कई बार मैंने विवादों को सुलह में बदलने में भी भूमिका निभाई। जब दो व्यक्ति पगड़ी बदलते हैं, तो वे एक-दूसरे को भाई मानने और विश्वास का संबंध निभाने का संकल्प लेते हैं। अतिथि का पगड़ी पहनकर स्वागत करना भी सम्मान की परंपरा रही है। इसी तरह, पिता के निधन के बाद ज्येष्ठ पुत्र को पगड़ी बांधने की रस्म परिवार की जिम्मेदारी सौंपने और उत्तराधिकार का प्रतीक रही है।
मेरे नाम से जुड़े मुहावरे- ‘पगड़ी की लाज रखना’, ‘पगड़ी उछलना’ और ‘पगड़ी बदल भाई’—राजस्थान की भाषा में मेरी गहरी उपस्थिति दर्शाते हैं। मैं वस्त्र से आगे बढ़कर रिश्तों, मर्यादा और सामाजिक विश्वास की प्रतीक बन गई हूँ।
इतिहास और शिल्प की विरासत
मेरा इतिहास बेहद पुराना है। प्राचीन साहित्य में मेरे लिए ‘उष्णीष’, ‘शिरोवेष्टन’ और ‘शिरस्राण’ जैसे शब्द मिलते हैं। ऐतिहासिक बहियों में मेरे विविध प्रकारों, रंगों, कपड़ों और कीमतों का उल्लेख मिलता है। सूती कपड़े से लेकर रेशम, मलमल और जरी तक, मैंने अनेक रूप धारण किए हैं। जसवंतशाही, चुड़ावतशाही, भीमशाही, उदयशाही, मानशाही और राजशाही जैसे नाम मेरी ऐतिहासिक विविधता को दर्शाते हैं। क्षेत्रीय शैलियों ने मुझे विशिष्ट पहचान दी है, जबकि कारीगरों के हुनर ने मेरे हर रूप को खास बनाया है। मुझे बांधना भी एक कला है। कपड़े की लंबाई, मोड़, कसावट और पेचों को साधने के लिए अभ्यास और कौशल चाहिए। एक कुशल पगड़ी बांधने वाला साधारण कपड़े को भी सांस्कृतिक गौरव के प्रतीक में बदल देता है। इसलिए मेरी परंपरा को बचाए रखना केवल एक पहनावे को संरक्षित करना नहीं, बल्कि उससे जुड़े लोककौशल को जीवित रखना भी है।
पर्यटन के माध्यम से दुनिया तक
आज मैं राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को देश-दुनिया तक पहुँचाने का माध्यम हूँ। प्रदेश में आने वाले पर्यटक मेरे रंगों और शैलियों से आकर्षित होते हैं। वे मुझे पहनकर तस्वीरें खिंचवाना, पगड़ी बांधना सीखना और मेरे पीछे छिपी परंपराओं को जानना चाहते हैं। पुष्कर मेले जैसे आयोजनों में पगड़ी बांधने की प्रतियोगिताएँ पर्यटकों को स्थानीय संस्कृति से जोड़ती हैं। जयपुर के पगड़ी संग्रहालय और उदयपुर की बागोर की हवेली जैसे सांस्कृतिक स्थल भी मेरे विविध रूपों को समझने का अवसर देते हैं। राजस्थान की पगड़ी प्रदेश के सांस्कृतिक पर्यटन की विशिष्ट पहचान है। पुष्कर मेले की पगड़ी बांधने की प्रतियोगिताओं, जयपुर के पगड़ी संग्रहालय और उदयपुर की बागोर की हवेली में इसके विविध रूप पर्यटकों को राजस्थान की लोकपरंपराओं से परिचित कराते हैं। पगड़ी बांधने की कला, इसके पारंपरिक रंग और क्षेत्रीय शैलियाँ राजस्थान की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत तथा स्थानीय शिल्पकौशल का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। यह परंपरा सांस्कृतिक अनुभवों, स्थानीय हुनर और पर्यटन के बीच एक जीवंत संबंध स्थापित करती है।मेरी पहचान, राजस्थान की पहचान समय के साथ पहनावे बदले हैं, लेकिन विवाह समारोहों, त्योहारों, मेलों और सांस्कृतिक आयोजनों में मेरी उपस्थिति आज भी कायम है। मैं नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ती हूँ और दुनिया को राजस्थान की सांस्कृतिक समृद्धि से परिचित कराती हूँ।
मैं राजस्थानी पगड़ी हूँ। मेरी पहचान मेरे रंगों या पेचों तक सीमित नहीं; मैं इस धरती के स्वाभिमान, आत्मीयता और लोकपरंपरा की वाहक हूँ। मेरी हर तह में एक कहानी है और हर रंग में राजस्थान का कोई न कोई भाव। जब भी कोई मुझे अपने सिर पर सजाता है, वह केवल एक परंपरागत वस्त्र नहीं पहनता, बल्कि राजस्थान की आन, बान और शान को सम्मान देता है।