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    सांस्कृतिक पहचान को कुचलने की कुचेष्टाएं कब तक?
    समाज

    सांस्कृतिक पहचान को कुचलने की कुचेष्टाएं कब तक?

    Lalit GargBy Lalit GargDecember 4, 2024No Comments7 Mins Read
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    ललित गर्ग

    भारत की समृद्ध सांस्कृतिक, धार्मिक एवं आर्थिक विरासत को कुचलने की चेष्टाएं अतीत से लेकर वर्तमान तक होती रही है। बहुत बड़ा सच है कि अगर किसी देश को नष्ट करना है तो उसकी सांस्कृतिक पहचान को खत्म कर दो। देश अपने आप नष्ट हो जाएगा। भारत पर हमला करने वाले विदेशी आक्रांताओं ने यही किया। इस्लामी आक्रांताओं ने न सिर्फ धन-संपदा लूटी बल्कि भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को खत्म करने के लिए बड़े पैमाने पर मंदिरों और धार्मिक स्थलों को तोड़ कर मस्जिदें बना दीं। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के शत्रु एवं तथाकथित धर्म-निरपेक्षता की राजनीति करने वाले नेता इस बात को अधिक बेहतर समझते हैं, अतः उन्होंने इतिहास को झुठलाने, धुंधलाने और काल्पनिक बातें गढ़ने एवं फैलाने पर ध्यान केंद्रित किया। हमारे नेताओं-नीतिकारों की नासमझी के कारण ही इसमें वे सफल भी रहे हैं। क्या यह स्थिति बदल रही है? देश में कुछ लोग सही इतिहास को उजागर करने एवं ऐतिहासिक विरासत को धुंधलाने एवं कुचलने की कुचेष्टाओं का परिमार्जन करने के लिये तत्पर हुए है, इसी का परिणाम है कि सैकड़ों वर्षों की गुलामी के बाद आज सनातन संस्कृति का पुनरुद्धार हो रहा है। अयोध्या, काशी, मथुरा के बाद संभल और अजमेर दरगाह जैसे मामलों में साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर भारत की सांस्कृतिक पहचान के प्रतीकों को हासिल करने के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे प्रयासों के द्वारा अशांति फैलाने का लक्ष्य नहीं है, बल्कि इतिहास बड़ी भूलों को सुधारना एवं वास्तविक तथ्यों को सामने लाना है। लेकिन, इसमें एक बड़ी बाधा है पूजा स्थल अधिनियम, 1991, जो देश में आजादी से पहले से मौजूद धार्मिक स्थलों जुड़े तथ्यों की खोजबीन की भी अनुमति नहीं देता है? क्या इसके चलते देश में आक्रांतवादी सोच एवं देश की विरासत को धुंधलाने की कोशिश पर पर्दा ही पड़ा रहेगा? ऐतिहासिक अन्याय, अत्याचार एवं राष्ट्र-विरोधी सोच एवं सच्चाई तो सामने आनी ही चाहिए। इस देश में उन विघटनकारी एवं संस्कृति-विरोधी लोगों की मर्जी कब तक चलती रहेगी? कब तक बात-बेबात हंगामा होता रहेगा? कब तक सांस्कृतिक पहचान को बेमानी साबित करने के षडयंत्र होते रहेंगे?

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    इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि इतिहास से न केवल छेडछाड़ हुई है बल्कि समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास को निस्तेज भी किया गया है। इसी बात को उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने उजागर करते हुए कहा कि हमारे इतिहास के साथ छेड़छाड़ की गई है। अतीत में यह बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर गृहमंत्री अमित शाह भी कह चुके हैं, यह बात पूर्व में भी बार-बार अनेक नेताओं ने कही है, लेकिन इतिहास को सही रूप में पेश करने का काम नहीं हो पा रहा है और वह भी तब, जब सभी इससे परिचित हैं कि सच्चे इतिहास की जानकारी के अभाव में लोगों के बीच नासमझी की खाई चोड़ी ही होती है, झूठे इतिहास को ही लोग सच मानने से उनकी अपनी परम्परा एवं इतिहास के प्रति आस्था की बजाय घृणा बढ़ती है। अपनी इतिहास एवं संस्कृति की विलक्षण एवं विशेषताओं से दूरी बनाकर झूठे इतिहास के कसीदें पढ़ने से राष्ट्र के प्रति गौरव का भाव क्षीण होता है। ऐसी स्थितियों में राष्ट्रीय एकता, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के गौरवपूर्ण क्षण कैसे सामने आ सकते हैं। झूठे इतिहास के कारण लोग संगठित कैसे हो सकते हैं? उनके स्वर विपरीत ही होते हैं, जिससे एक-दूसरे से जुड़ना तो दूर आपसी द्वेष, नफरत एवं द्वंद्व की स्थितियां ही राष्ट्र पर हावी होती है। सही इतिहास जानने की इस महत्ता से हमारे नीति-निर्माता अनभिज्ञ रहे हैं। अन्यथा इस विषय पर यहां इतनी दलबंदी न होती। हमें एक असहिष्णु, उन्मादी एवं कट्टरवादी समाज बनने के रास्ते पर ही नहीं, बल्कि भीतर से ज्यादा से ज्यादा विभाजित एवं कमजोर समाज बनने के रास्ते पर धकेला जा रहा है। इस तरह की स्थितियां एवं मुहिमें देश की एकता एवं अखण्डता पर आघात करती है।

    भारतीयों ने गणित व खगोल विज्ञान पर प्रामाणिक व आधारभूत खोज की। शून्य का आविष्कार, पाई का शुद्धतम मान, सौरमंडल पर सटीक विवरण आदि का आधार भारत में ही तैयार हुआ। वसुधैव कुटुम्बकम का विचार इसी देश ने किया। अहिंसा यहां की जीवनशैली का सौन्दर्य रहा है, विविधता में एकता को हमने जीकर दिखाया है, लेकिन हमारी उदारता को आक्रांताओं एवं विभाजनकारी ताकतों ने हमारी कमजोरी मान लिया है। यही कारण है कि तात्कालिक एवं अतीत की कुछ नकारात्मक घटनाओं व प्रभावों ने जो धुंध हमारी सांस्कृतिक जीवन-शैली पर आरोपित की है, उसे सावधानी पूर्वक हटाना होगा। आज आवश्यकता है कि हम अतीत की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजें और सवारें तथा उसकी मजबूत आधारशिला पर खडे़ होकर नए मूल्यों व नई संस्कृति को निर्मित एवं विकसित करें। ऐसा करके ही हम नया भारत-सशक्त भारत निर्मित कर पायेंगे। समृद्ध संस्कृति भारत की एक विरासत है। इसमें धर्म, अध्यात्मवाद, ललित कलाएं, ज्ञान विज्ञान की विविध विधाएं, नीति, दर्शन, विधि, विधान, जीवन प्रणालियां और वे समस्त क्रियाएं और कार्य हैं जो उसे महान बनाती है। समय-समय पर इसका विविध संस्कृतियों के साथ संघर्ष, मिलन, परिवर्तन, परिवर्धन और आदान-प्रदान हुआ है। भारतीयों की अनेक भावनाओं पर शताब्दियों से समय-समय पर आती रहने वाली विविध जातियों ने बहुत पहले से ही अपना न्यूनाधिक प्रभाव डाल रखा था। परंतु इस्लाम के आ जाने पर भारतीय संस्कृति में एक हलचल सी मच गयी, सांस्कृतिक विरासत को ध्वस्त करने के सलक्ष्य प्रयत्न हुए, कला, धार्मिकता, शिल्प के मन्दिरों को ध्वस्त करके मस्जिदों का निर्माण कराया गया। लेकिन इन ऐतिहासिक भूलों को सुधारने का अवकाश तो हमेशा से रहा है।

    सर्वोच्च न्यायालय ने संभल मस्जिद मामले में 29 नवंबर 2024 को स्थानीय अदालत की कार्यवाही पर अस्थायी रोक लगा दी। इस मामले में विपक्षी दल विशेषतः कांग्रेस एवं समाजवादी पार्टी उत्तरप्रदेश सरकार को जबरन घसीट रही है, जबकि सर्वोच्च अदालत शांति बनाये रखने के लिये मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय को सुनवाई करने का निर्देश दिया है। 24 नवंबर को अदालती निर्देश पर हुए सर्वे के दौरान खूनी हिंसा, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई थी, उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने जो निर्णय दिया, उसका मर्म यह है कि मामले में फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या सच है या फिर कौन समुदाय कितना उपद्रव करता है और वह शासन-व्यवस्था के लिए कितनी बड़ी चुनौती बन सकता है। अर्थात चाहे ‘अन्याय’ कितना भी बड़ा हो, अदालत ‘न्याय’ से अधिक ‘शांति-सद्भावना’ को वरीयता देगी। देरसबेर न्याय होता हुआ देखा भी गया है, अयोध्या में बना श्रीराम मन्दिर इस का उदाहरण है।

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    आक्रांताओं द्वारा नष्ट किए गए धार्मिक स्थल सिर्फ धार्मिक प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे भारत की सभ्यता एवं संस्कृति की ऊंच रोशनी की मीनारें है। कांग्रेस ने इनके दमन का ही सिलसिला जारी रखा। इस तरह इतिहास का मिथ्याकरण और देश की नई पीढ़ी को उनके पूर्वजों के वास्तविक अनुभवों को जानने से वंचित रखना हर हाल में गलत है, त्रासद है, विडम्बनापूर्ण है। कठोर वास्तविकताएं एवं समृद्ध सांस्कृतिक विरासत भारत का यथार्थ है तो अप्रिय प्रवृत्तियां, विभाजनकारी सोच एवं समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का विध्वंस भी बड़ा यथार्थ है। मुगल शासक हो या अंग्रेजी शासक या आजादी के बाद की सरकारें -राजनीतिक उद्देश्यों एवं वोट की राजनीति के चलते मुस्लिम तुष्टीकरण को अपनाया। यही कारण है कि भारत पर अन्याय-अत्याचार करने एवं आक्रांता बन देश को लुटने वालों को हमने हीरो बनाया और उनके नाम पर प्रमुख मार्गों का नामकरण किया, पाठ्य-पुस्तकों में उनको महिमामंडित किया। लेकिन यहां लंबे समय से इतिहास और वर्तमान के अप्रिय प्रसंगों पर चुप्पी की परंपरा बनी हुई है। अब यह चुप्पी टूट रही है तो निश्चित ही दूध का दूध एवं पानी का पानी होकर रहेगा। भारत अपनी समृद्ध विरासत को पुनः नये शिखर पर स्थापित कर पायेगा। मस्जिदें हो या अन्य ऐतिहासिक धरोहर -उनके झूठे इतिहास एवं तथ्यों और उनके तमाम प्रचलित निष्कर्ष निराधार हैं, भ्रामक है, बेबुनियाद है, जिन्हें राजनीतिक उद्देश्य से प्रचारित किया गया। जबकि सच्ची बातों और कटु स्मृतियों का दमन हुआ। हालांकि ऐसी स्मृतियां मिटती नहीं, वे तो ज्वालामुखी होकर फटती हैं, सच को सामने लाती है।

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    Lalit Garg
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    40 साल का अनुभव, स्वतंत्र लेखक, स्तंभकार, पत्रकार एवं समाजसेवी, बी. काम करने के बाद पत्रकारिता में डिग्री। अध्यक्ष- सुखी परिवार फाउण्डेशन, कार्यकारी अध्यक्ष- विद्या भारती स्कूल, सूर्यनगर, गाजियाबाद

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