जयपुर ब्यूरो (राजस्थान)
जयपुर में इस बार का तीज उत्सव मात्र एक पारंपरिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह नारी नेतृत्व, नारी सृजन और नारी आराधना का एक गौरवशाली महोत्सव बन गया। यह पर्व, जिसने स्पष्ट किया कि परंपरा और प्रगति विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं, आधुनिकता के साथ सांस्कृतिक जड़ों को कैसे सहेजा जा सकता है, इसका जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया। राजस्थान की महिला उपमुख्यमंत्री, महिला पुरोहित, महिला उद्यमी और स्वयं देवी पार्वती—तीज माता के रूप में—इस असाधारण महोत्सव के चार मुख्य स्तंभ बनकर उभरीं।
राज्य की उपमुख्यमंत्री और पर्यटन मंत्री दिया कुमारी की दूरदर्शी पहल ने इस वर्ष की तीज यात्रा को महिला सशक्तिकरण की एक अद्वितीय मिसाल में बदल दिया। उन्होंने तीज उत्सव के माध्यम से पर्यटन, संस्कृति और महिला सशक्तिकरण के त्रिकोण को सफलतापूर्वक जोड़ा, यह दिखाते हुए कि कैसे उत्सव समाज में नवचेतना और सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। जयपुर का यह तीज उत्सव इस बार केवल रथों, बग्घियों और नृत्य की झांकी तक सीमित नहीं रहा; यह उस चेतना की यात्रा बनी जिसमें हर महिला की मुस्कान में इतिहास और भविष्य, दोनों की झलक थी। यह उत्सव एक सशक्त संदेश दे गया कि “जहां नारी की पूजा होती है, वहीं संस्कृति का उत्थान होता है।
महिला सशक्तिकरण की अनुपम मिसाल
यह दो दिवसीय महोत्सव (27-28 जुलाई, 2025) महिलाओं की भागीदारी को न केवल दर्शक के रूप में, बल्कि नेतृत्वकर्ता, संस्कारकर्ता और सृजनकर्ता के रूप में सामने लाया। महोत्सव का सबसे ऐतिहासिक क्षण तब आया जब महिला पुरोहितों ने तीज माता की महाआरती की। यह 298 वर्षों की परंपरा में पहली बार था जब महिला पुरोहितों ने इस शाही धार्मिक अनुष्ठान में भाग लिया, जो लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। इसके अतिरिक्त, महिला उद्यमियों द्वारा तीज मेले का शुभारंभ और महिलाओं द्वारा विशेष रूप से सजाई गई सांस्कृतिक झांकियों ने यह सुनिश्चित कर दिया कि यह तीज उत्सव केवल परंपरा नहीं, बल्कि परिवर्तन की एक नई परिभाषा भी है।
सजीव परंपरा में आधुनिक पहचान
जयपुर के सिटी पैलेस की जनानी ड्योढ़ी से शुरू होकर त्रिपोलिया गेट, छोटी चौपड़, चौगान स्टेडियम से होते हुए पौण्ड्रिक उद्यान तक पहुंचने वाली तीज माता की सवारी एक चलती-फिरती विरासत थी। इस सवारी में राजस्थानी लोक कलाकारों, शाही बग्घियों, सजे हुए हाथियों, ऊंटों, घोड़ों और सैकड़ों नारी-कलाकारों की शानदार भागीदारी रही। सदियों से चली आ रही इस परंपरा को इस बार राजनीतिक और सांस्कृतिक नेतृत्व की महिला उपस्थिति ने एक नया और गहरा अर्थ दिया। उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी स्वयं तीज माता की महाआरती के लिए छोटी चौपड़ पर उपस्थित रहीं, जहाँ उन्होंने मंच से राज्यपाल हरिभाऊ बागडे, विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और देशी-विदेशी पर्यटकों के साथ श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की।
जब लहरियों ने गूंजा दिया नारी स्वर
महिलाओं की झांकियों में लहरिया की रंगीन साड़ियों में कलश सिर पर उठाए नाचती-गाती महिलाओं की कतारें किसी सजीव रेखाचित्र की तरह प्रतीत हो रही थीं। ये झांकियां मात्र सजावट नहीं थीं, बल्कि राजस्थान की स्त्री परंपरा की जीवंत गूंज थीं, जिसमें श्रद्धा और ऊर्जा साथ-साथ बह रही थी। कालबेलिया, गैर, चरी नृत्य, कठपुतली, कच्छी घोड़ी, और हेला ख्याल जैसी पारंपरिक प्रस्तुतियों ने लोक-संस्कृति का ऐसा रंग भरा कि विदेशी सैलानी भी तालियों से झूम उठे।
पहली बार ‘महाआरती’ का ऐतिहासिक क्षण
छोटी चौपड़ पर इस बार पहली बार महाआरती का भव्य आयोजन किया गया, जो ड्रोन से पुष्पवर्षा और शाही बैंड की स्वरलहरियों के साथ एक अविस्मरणीय अनुभव बन गया। इस आयोजन को पूरे राजस्थान में 200 से अधिक सार्वजनिक स्क्रीन पर प्रसारित किया गया, ताकि राज्य के हर कोने में यह उत्सव साझा किया जा सके। पूर्व राजपरिवार के सदस्य पद्मनाभ सिंह ने भी त्रिपोलिया गेट पर तीज माता की आरती की, जिससे शाही परंपरा और जन भागीदारी का एक अद्वितीय संगम दिखाई दिया।
यह सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक घोषणा थी। इस आयोजन से यह स्पष्ट हो गया कि राजस्थान सरकार की पर्यटन नीति केवल पर्यटकों को आकर्षित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक अस्मिता, महिला भागीदारी और सामाजिक नवाचार को भी साथ लेकर चल रही है। महिला उपमुख्यमंत्री, महिला पुरोहित, महिला उद्यमी और तीज माता – ये चार प्रतीक इस साल की तीज को एक नई और सशक्त परिभाषा दे गए।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण की पृष्ठभूमि
दिया कुमारी के नेतृत्व में तीज को केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनरुत्थान और सामाजिक संवाद के मंच के रूप में विकसित किया गया। इस आयोजन ने दिखा दिया कि कैसे लोक परंपराओं को सहेजते हुए उन्हें समकालीन सामाजिक विमर्श से जोड़ा जा सकता है। तीज की यह यात्रा केवल शहर के रास्तों से नहीं गुजरी, यह राजस्थान के स्त्री मन और सामाजिक चेतना से होकर गुजरी है। निःसंदेह, जयपुर की तीज ने इस बार सिर्फ तीज माता को नहीं, बल्कि हर उस नारी को आराध्य बनाया, जो जीवन में आस्था, शक्ति और सुंदरता का संगम है।
पौण्ड्रिक पार्क: लोक संस्कृति और महिला उद्यमिता का संगम
सवारी के समापन स्थल पौण्ड्रिक पार्क इस बार सांस्कृतिक विरासत और महिला नेतृत्व का उत्सव स्थल बन गया। पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित तीज मेला यहां दो दिनों तक चला, जिसमें स्थानीय महिला उद्यमियों द्वारा 15 से अधिक स्टॉल्स लगाए गए। इनमें पारंपरिक हस्तशिल्प, लहरिया वस्त्र, टेराकोटा, कांच कला, और घरेलू उत्पादों की मनमोहक झलक देखने को मिली। महोत्सव की सांस्कृतिक संध्या में प्रतिदिन शाम 8 से 9 बजे तक लोक कलाकारों की रंगारंग प्रस्तुतियां हुईं। इस सांस्कृतिक समागम में सैकड़ों की संख्या में देशी-विदेशी पर्यटकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। महिलाओं और युवतियों के लिए झूले, मेहंदी और पारंपरिक खाने की विशेष व्यवस्थाएं की गईं, जिससे पौण्ड्रिक पार्क तीज का एक जीवंत चौक बन गया।