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    मरू महोत्सव: रेगिस्तान की आत्मा का सार्वजनिक उत्सव
    टूरिज्म

    मरू महोत्सव: रेगिस्तान की आत्मा का सार्वजनिक उत्सव

    NM Media SolutionsBy NM Media SolutionsFebruary 2, 2026Updated:February 2, 2026No Comments4 Mins Read
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    जयपुर/जैसलमेर। राजस्थान पर्यटन आयुक्त रूकमणी रियाड़ के अनुसार, थार मरुस्थल की सांस्कृतिक पहचान माने जाने वाले जैसलमेर मरू महोत्सव का समापन परंपरागत रूRaप से माघ पूर्णिमा के दिन संपन्न हुआ। वर्ष 2026 में आयोजित यह 47वां डेजर्ट फेस्टिवल पर्यटन और संस्कृति दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने बताया कि बीते तीन वर्षों से पोकरण को महोत्सव में शामिल किया गया है और अब इसका स्वरूप चार दिवसीय हो चुका है, जिससे आयोजन का दायरा जैसलमेर तक सीमित न रहकर पूरे मरुक्षेत्र तक विस्तारित हुआ है।

    पर्यटन आयुक्त रूकमणी रियाड़ ने कहा कि मरू महोत्सव का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन नहीं, बल्कि मरुस्थलीय विरासत को संरक्षित करते हुए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन को बढ़ावा देना है। इसी क्रम में इस वर्ष भी महोत्सव की शुरुआत पोकरण से की गई, जहां धार्मिक अनुष्ठान, शोभायात्रा और स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियों के साथ कार्यक्रमों का आगाज हुआ।
    Rukmani-Riyad

    पोकरण के बाद आयोजन जैसलमेर पहुंचा, जहां गड़ीसर झील, शहीद पूनम सिंह स्टेडियम, डेडानसर स्टेडियम, सम, लाखमणा और खुड़ी सैंड ड्यून्स सहित विभिन्न स्थलों पर सांस्कृतिक, पारंपरिक और खेलकूद प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। चार दिन चले इस आयोजन में लोकगीत-लोकनृत्य, ऊँट दौड़, ऊँट सजावट, ऊँट पोलो, पगड़ी बांधना व मूंछ प्रतियोगिता, ग्रामीण खेल, हस्तशिल्प एवं फूड फेस्टिवल जैसे कार्यक्रमों ने देश-विदेश से आए सैलानियों को आकर्षित किया।

    Rajasthan-Tourism

    पोकरण को जोड़ने से बढ़ा दायरा : कमलेश्वर सिंह
    पर्यटन विभाग के सहायक निदेशक, जैसलमेर कमलेश्वर सिंह के अनुसार, पोकरण को मरू महोत्सव से जोड़ने का मुख्य उद्देश्य मरुस्थलीय सांस्कृतिक विरासत को व्यापक मंच देना और पर्यटन गतिविधियों को जैसलमेर के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों तक विस्तारित करना है। उन्होंने बताया कि इससे स्थानीय कलाकारों, ग्रामीण खेलों और क्षेत्रीय परंपराओं को नई पहचान मिली है।

    कमलेश्वर सिंह ने कहा कि मरू महोत्सव की औपचारिक शुरुआत वर्ष 1979 में हुई थी, जब राजस्थान सरकार ने मरुस्थलीय जिलों को पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने की नीति अपनाई थी। प्रारंभिक वर्षों में लोकगीत-लोकनृत्य, ऊँट सजावट और पारंपरिक वेशभूषा इसके मुख्य आकर्षण रहे। समय के साथ ऊँट इस महोत्सव का केंद्रीय प्रतीक बन गया और ऊँट दौड़, ऊँट नृत्य व सुसज्जित ऊँट प्रतियोगिताओं ने इसे राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

    उन्होंने यह भी बताया कि मरू महोत्सव के इतिहास में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह दर्ज है कि गुजरात में आए विनाशकारी भूकंप के दौरान राष्ट्रीय शोक और संवेदनशीलता के मद्देनज़र इसका आयोजन नहीं किया गया था। यह निर्णय सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारी के अनुरूप लिया गया था।

    मरुस्थलीय लोकसंस्कृति के संरक्षण और ऑफ-सीजन पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मरू महोत्सव की शुरुआत की गई। लोकगीत-लोकनृत्य, ऊँट सजावट और पारंपरिक वेशभूषा प्रमुख आकर्षण रहे।

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    -दलीप सिंह राठौड़, संयुक्त निदेशक, पर्यटन

    विदेशी सैलानियों की मजबूत मौजूदगी
    47वें मरू महोत्सव के दौरान बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक जैसलमेर पहुंचे। पर्यटन विभाग के अनुसार, इस बार भी जर्मनी, फ्रांस और हॉलैंड सहित कई यूरोपीय देशों से सैलानी महोत्सव देखने पहुंचे। रेगिस्तान में आयोजित लोकनृत्य, ऊँट प्रतियोगिताएं और खुले आकाश के नीचे होने वाली सांस्कृतिक संध्याएं विदेशी पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण रहीं।

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    30 से 40 हजार घरेलू पर्यटक
    महोत्सव के दौरान 30 से 40 हजार तक घरेलू पर्यटकों की उपस्थिति दर्ज की गई। इनमें प्रमुख रूप से राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल से पर्यटक शामिल रहे। होटल, रिसॉर्ट, होम-स्टे और डेजर्ट कैंपों में लगभग पूर्ण बुकिंग की स्थिति रही। पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों के अनुसार, मरू महोत्सव के चलते स्थानीय बाजार, हस्तशिल्प विक्रेता, लोक कलाकार और परिवहन सेवाओं को सीधा लाभ मिला।

    माघ पूर्णिमा पर पारंपरिक समापन
    माघ पूर्णिमा के दिन धार्मिक अनुष्ठानों और अंतिम सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ मरू महोत्सव का पारंपरिक समापन हुआ। जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग ने आयोजन को सफल बताते हुए कहा कि मरू महोत्सव अब राजस्थान के पर्यटन कैलेंडर का स्थायी और प्रमुख आयोजन बन चुका है।

    #CulturalRajasthan #Rajasthan Tourism Meru Mahotsav
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